कोरोना के लिये सरकारी कुछ आंकड़े देखे तो भारत मे कोरोना फैला कहा और ज्यादातर जो राज्यो में फैला उसका एक निष्कर्ष बनता है जो यहा रखा गया है।
भारत मे सबसे ज्यादा प्रभाव उन्ही क्षेत्रो में हुआ जिनको हम ज्यादा डेवलप मानते थे। जैसे महाराष्ट्र, दिल्ही गुजरात। तो यह पता चलता है कि आपत्ति के समय आपका विकास या तथाकथित विकास काम नही लगता ओर यह सिर्फ भारत की बात नही आप दुनिया पे नजर उठा ले यह वही ज्यादा फैला जहा डेवलपमेंट का डंका पूरी दुनिया मे गूंज रहा था। जैसे अमरीका, स्पेन, इटली, जर्मन, इंग्लैंड, फ्रांस और चीन जिसने विकास के लिये ही जीना शुरू कर दिया था।
ठीक है अब भारत की बात करे और क्या सीखे उसपे नजर करते है।
भारत मे भी यह फैला ज्यादा अर्बन भारत मे न कि रूरल भारत मे अर्थात इंडिया में फैला न कि भारत मे क्योंकि गांधीजी कहा करते थे असली भारत गाँव मे बसता है जो कि आज यह बात साबित भी हुई।
कोरोना से भारत बचा हुआ से अर्थात रूरल इंडिया और अर्बन इंडिया चपेट में आ गया।
भारत के शहरों और बड़े शहरों में तेजी से बढ़ा, जितना बड़ा शहर उतना ज्यादा आंकड़े दिखाई देते है या संक्रमण भी उधर ही ज्यादा हुआ, जैसे मुम्बई ओर दिल्ली सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र रहे और भारत के बड़े शहर का भी यही हाल है।
जहा इंटरनेशनल एरपोर्ट या टूरिज़्म या आवागमन ज्यादा रहता है लोगो का। उसके आंकड़े भी साफ दिखाई देता है कि प्रभाव बढ़ा जिसमे मुम्बई, दिल्ही, अहमदाबाद, इंदौर, आगरा वगेरा।
आज भी रूरल एरिया कोरोना से प्रभावित नही हुआ यह कोई भी राज्य के आंकड़े से आपको पता चल सकता है या जो राज्य को पिछड़ा मानते है वहा उतना संक्रमण नही हुआ जैसे बिहार, छतीसगढ, ज़ारखण्ड या पूर्वांचल के राज्य।
अब रूरल इंडिया की बात करे या पहाड़ी क्षेत्र की तो यहां प्रभाव कम होने का कारण जनसंख्या की घनता कम होना, गाँव मे लोग ऐसे भी सेल्फ आइजोलेशन में ही जीते है तो संक्रमण भी कम होना।
जो लोकड़ाउन में सरकार समजा रही है कि कैसे जीना वैसे हमारी पुरानी गाँव की परंपरा याद आती है जैसे हाथ न मिलाना उसके जगह नमस्कार करना जो कि योग की एक मुद्रा है और भारतीय परंपरा में हजारों साल से चली आती है। सोश्यल डिसटनसिंग का पालन करना जो कि गाँव मे भीड़भाड़ इतनी रहती नही ओर शॉपिंग कल्चर उतना है ही नही।
घर का खाना, जो भारत में हजारो साल से परम्परा रही जो आधुनिक भारत के शहरों में रेस्टोरेंट द्वारा समाप्त हुई पर गाँव मे अभी भी है।
गर्म पानी पीना , कुछ जड़ी बूटी जैसे निम, गिलोय, हल्दी वगेरे जो भारत मे आयुर्वेद के जरिये हजारो साल से भारत मे इसका खूब प्रचार रहा।
अगर मास ट्रांसपोटेशन न हो इसकी असर पर्यावरण पे भी देखने को मिली और सारी प्रकृति अपने आप सुंदर बनने लगी।
कोरोना की असर ओर आंकड़े दिखाने लगे कि हमारी व्यवस्था अर्थात गाँव स्वावलंबी हो तो यह व्यवस्था न सिर्फ इन महामारी के समय काम आती है पर पर्यावरण को भी सुरक्षित रखती है।
अब समझना यह है कि सरकार की जो नीतियां रही के गाँव छोड़ छोड़ के लोग शहर में रोजगार के लिये जाते है तो नीतियां बदले जिसके लिये मास माइग्रेशन करना न पड़े। गाँव को स्वावलंबी करे जिसके लीये मास ट्रांसपोटेशन कम हो, इससे आपको न कि सिर्फ ऐसे समय मे लोगो को अपील कर कर थकना पड़े की घर मे रहे पर हमेशा के लिये पर्यावरण की समस्या भी काफी देश मे कम हो, जैसे दिल्ही में तो सांस लेना भी मुश्किल है कोरोना जाये तो भी आप का काम नही कम होने वाला ओर ऐसे देश के दूसरे शहर में भी खतरे की घण्टी बज ही रही है।
दूसरा मास ट्रांसपोर्ट कम होने से आपका ऑइल इम्पोर्ट बंध हो जायेगा जिसका देश को आर्थिक फायदा कितना होगा और पर्यावरण का फायदा तो अनमोल है उसका तो कोई मोल हो नही शकता।
ज्यादातर लोग कृषि से जुड़े हो, घर के आंगन में गाय हो , गाँव मे जीने के जरूरी सामान उपलब्ध हो तो जीना कहा मुश्किल है, यह भागदौड़, कॉम्पिटिशन किसके लिये, प्रकृति को हराकर एक दूसरे देश नम्बर 1 बनना चाहते है जिसमे सभी घाटे में ही जा सकते है। हमारे तो सभी भगवान या महापुरुष सादगी का जीवन जिये ओर उसको धारण करने को कहा न भोग की बात कही फिर क्यों इतनी भागदौड़ जिसमे मानवजात अपने को ही हराने में लगा हुआ है।
अभी भी प्रकृति इशारा कर रही है समझ जाये ओर मनुष्य अपने को बचा ले यह छोटे से वायरस आगे आप की सब टेक्नोलोजी फीकी लगने लगी है तो प्राकुतिक जीवन ही मनुष्य के आगे एकमात्र मार्ग है।
दूसरा मास ट्रांसपोर्ट कम होने से आपका ऑइल इम्पोर्ट बंध हो जायेगा जिसका देश को आर्थिक फायदा कितना होगा और पर्यावरण का फायदा तो अनमोल है उसका तो कोई मोल हो नही शकता।
ज्यादातर लोग कृषि से जुड़े हो, घर के आंगन में गाय हो , गाँव मे जीने के जरूरी सामान उपलब्ध हो तो जीना कहा मुश्किल है, यह भागदौड़, कॉम्पिटिशन किसके लिये, प्रकृति को हराकर एक दूसरे देश नम्बर 1 बनना चाहते है जिसमे सभी घाटे में ही जा सकते है। हमारे तो सभी भगवान या महापुरुष सादगी का जीवन जिये ओर उसको धारण करने को कहा न भोग की बात कही फिर क्यों इतनी भागदौड़ जिसमे मानवजात अपने को ही हराने में लगा हुआ है।
अभी भी प्रकृति इशारा कर रही है समझ जाये ओर मनुष्य अपने को बचा ले यह छोटे से वायरस आगे आप की सब टेक्नोलोजी फीकी लगने लगी है तो प्राकुतिक जीवन ही मनुष्य के आगे एकमात्र मार्ग है।

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