एक बार लोकल ट्रेन में आनंद से अहमदाबाद जा रहा था, खुद को बहुत पढा लिखा और जागृत समझ रहा था। कुछ आदिवासी सामने बैठे थे मूंगफली के छिलके ट्रेन में फेंक दिये तो मैने डाट दिया ओर मेनर सिखाने लगा में। आज थोड़े वर्ष के चिंतन के बाद पता चला कि जो ट्रेन में पढ़े लिखे होते है वह ज्यादा तर प्लास्टिक के पैकेट ओर पाउच वाले प्रोडक्ट लेते है और वह डस्टबिन में डालते है। अब थोड़े वर्षो के बाद पता चला कि जो ट्रेन में छिड़के डाले थे वह तो ट्रेन बिगाड़ शकते है पर यह पृथ्वी नही पर जो पढ़े लिखे है वह ट्रेन नही बिगाड़ते पर दुनिया तो बिगाड़ रहे है। अब दूरदृष्टि किसकी ज्यादा अच्छी आदिवासियो की या पढ़ी लिखी जनता की जिसके उपभोक्तावाद से पृथ्वी और प्रकृति पे संकट खड़ा है। ट्रेन बिगड़ी वह तो शायद कुछ ही समय मे साफ हो जायेगी और यह धरती गन्दी हम कर रहे है वो तो काफी समय लगेगा। जागृत सही में हम है या अंधकार में। अब हम उनको बेकवर्ड बोलते है, ओर वो हमको ज्यादा स्मार्ट समझते है तो कल वो हमारी नकल करके उनके देशी ओर हेल्थी खाने को छोड़के पैकेज फूड खायेंगे ओर डस्टबिन बीन में डालने की आदत तुरन्त नही आयी तो शायद रॉड पे डाल देंगे या डस्टबिन में डाले भले वह आदत देर स्व आये पर मार्ग तो प्रकाश से अंधकार का हो रहा है ना। यह कैसी समाज व्यवस्था हम बनाने जा रहे है?
आदिवासियों के क्षेत्र भी ज्यादातर प्रकृति से मिले वह जैसे के वैसे ही ज्यादातर पर पढ़े लोगो के महानगर तो सांस भी नही ले सकते इतने प्रदूषित किये है। में तो दिल्ही या अहमदाबाद जैसे बड़े नगरों में वह अनुभव किया है और आदिवासी क्षेत्र में जाके भी अनुभव किया। पढ़ाई तो शहरो में इतनी की है कि दुनिया के सबसे बड़ी डिग्री वाले रहते है उधर पर जीने ढंग तो पिछड़ा लग रहा है।
अब पढ़लिख लिया तो जीने के लिये इतनी चीजे चाहये की प्राकृतिक संपदा पर खतरा आ गया और सब जहरीली केमिकल वाली दुनिया का विनाश करने वाली इतनी प्रोडक्ट हर रोज डस्टबिन पड़ती है कि वो कचरा कहा जायेगा वह कोई सोचता तक नही। जमीन तो गंदी कर दी अब महासागर में कचरा जा रहा है। यहां तक कि स्पेस सायन्स में इतना डेवलप किया के मुझे स्पेस सायन्स सेंटर में जाके पता चला की ऊपर भी तो हम तो कचरा डाल रहे है जिसको स्पेस गार्बेज बोलते है। मंगल पे भी जीवन क्या उसी लीये ढूंढ रहे है कि जो पृथ्वी की हालत की वहा भी ऐसी ही हालात कर देंगे।
