पंद्रह अगस्त को अंग्रेज भारत छोड़े, अंग्रेजियत नही। वह तो ओर भी मजबूत होती गई।
यह जो चित्र हे बहुत कम देखने को मिलता हे इसको आर्थिक तरिके से नहीं पर भावना से देखा जाये, यह मेरे देश का हे, और गांव में दिखने को मिलता हे, शेहर में नहीं, जिसे पिछड़ा बताया गया. क्योंकि यह मेरे देश की भूषा हे, यह मेरे देश का स्वदेसी मकान हे, जिसमे कोई कोर्पोरेट का सेमेंट या स्टील का उपयोग नही किया गया. यह सादगी और सरलता नजदीकी प्रकृति के हिसाब से जीने का हमारा ढंग हे।
सायद मेरे बात पे कुछ बुद्धिजीवियों को हसना आएगा, क्योंकि पिछले दोसो साल में दिमाग में भर दिया गया की यह सब पिछड़ापन हे, में सूट टाई पहुनु, अंग्रेजी बोलू, बड़े बगंले में रहु तो ही में विकसित. मेरे देश में भगवान श्री राम, बुद्ध, महावीर, नानक, गांघीजी सब ने तो यही पोशाक पहने थे. सब लोग जनभाषा ही तो बोले थे, सब सादगी में तो ही जिए थे, सब के घर न महलो के थे पर कुटिया ही तो थे, इस देश की संस्कृति सादगी और अपरिग्रह पे हे तो उसको अब क्यों पिछड़ापन मान लिया।
हम तो आज़ादी इसी के लिए तो लड़े थे के सब चीज़े स्वदेसी हो, स्वराज हो ,अपनी हो फिर यह आज़ादी की बाद क्यों नया नाटक शुरू हो गया की भाषा, भूषा, भोजन सब उनका इतना फैला की इतना कभी नही था अब यह लगने लगा कि हमारी सभ्यता ही विदेशी लग रही है।
हमारा निम् का दातुन या मंजन छोड़के टूथपेस्ट करने लगे और हम आज़ाद हो गये। (टूथपेस्ट पे उनके देश मे ही केस चल रहा है स्वास्थ को हानिकारक गिनके)।
गांव तोड़ के शहर बसाने लगे और हम आजाद हो गई।
हमारी अपनी भाषा ही अब पराई लगने लगी और हम आजाद हो गये।
हमारा स्वास्थ्य वर्धक खाना छोड़ के विदेशी भोजन खाने लगे और हम आजाद हो गये।
हमारी जड़ीबूटीयो को छोड़के विदेशी दवा खाने लगे और हम आजाद हो गये।
हमारी गाय आधारित कृषि छोड़ के उनकी जहरीली प्रकार की तथाकथित मॉडर्न कृषि की जमीन को और किशान को बर्बाद किया और कह ने लगे की हम आज़ाद हो गये।
हमारी प्रकृति के हिसाब से कपड़े पहनना छोड़ा और उनके कपड़े पहने और फिर बोल रहे हे की आज़ाद हो गये।
हमारी बैलगाड़ी छोड़के बड़ी कार घरो में भर दी गयी, ग्रामोद्योग को तोड़के बड़े कारखाने लगाए गये और फिर बोले की प्रकृति का संतुलन नहीं रहा
हमारे खेल को छोड़ के उनके खेल को तो इतना गले लगाया की खिलाडी को भगवान बना दिया जो पर्यावरण की और स्वास्थ्य को नुकशान करने वाली प्रोडक्ट्स को उपभोग करने के लिए दिनरात विज्ञापन करते हे और हम आज़ाद हो गये।
हर गांव में नट थे जो गांव का मनोरंजन करते थे, अच्छे विषयो पे नाटक करते थे, रामलीला होती थी पर उसमे भी केन्द्रीकरण करके बॉलीवुड के नट को करोड़पति बनाया जिनका भी मुख्य काम अश्लीलता फैलाना, पेसो लिये फालतू प्रोडक्ट्स का विज्ञापन करना और लोगो को बुरी आदत लगाना जिससे गांव गांव के नट भूखे मरने लगे और हम बोलते ही की आज़ाद हो गये।
हमारे खेल को छोड़ के उनके खेल को तो इतना गले लगाया की खिलाडी को भगवान बना दिया जो पर्यावरण की और स्वास्थ्य को नुकशान करने वाली प्रोडक्ट्स को उपभोग करने के लिए दिनरात विज्ञापन करते हे और हम आज़ाद हो गये।
हर गांव में नट थे जो गांव का मनोरंजन करते थे, अच्छे विषयो पे नाटक करते थे, रामलीला होती थी पर उसमे भी केन्द्रीकरण करके बॉलीवुड के नट को करोड़पति बनाया जिनका भी मुख्य काम अश्लीलता फैलाना, पेसो लिये फालतू प्रोडक्ट्स का विज्ञापन करना और लोगो को बुरी आदत लगाना जिससे गांव गांव के नट भूखे मरने लगे और हम बोलते ही की आज़ाद हो गये।
उनके विकास की नकल करने की, वह खड्डे में गिरे तो हमको भी गिरने का, यह सब तो गुलामी की निसानिया हे।
कानून सब अंग्रेजो के, इंडियन फारेस्ट एक्ट हो या इंडियन हाई कोर्ट एक्ट, या फिर भारत का बंधारण ही सही जो गोवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के हिसाब से बनाया जिसमे पूर्ण केंद्रीकरण, न गाव को कोई सता, देखके तो यही लग रहा है कि गांधीजी के ग्राम स्वराज की हत्या तो आज़ादी के बाद काले अंग्रेज ने ज्यादा की गोरे अंग्रेजो से।
हमारे इतने महान राजा हुए उनके प्रशासन की पद्धति इतनी खराब थी क्या कब कुछ भी नही लिया। न शिवाजी का, न विजयनगर का, विक्रमादित्य का।
देश के जनता को ऐसे बेवकूफ बनाया गया कि वह तो राजा शाही थी। जबकि अंग्रेजो के दस्तावेज कहते है थी हर गाँव पूर्ण लोकशाही थी और राजा कभी दखलंदाज़ी नही करता था। अब तो सब निर्णय तो संसद लेती हे, प्रजा के पास तो कोई हक नहीं की उनके गांव में रेवेन्यू का कलेक्शन और उसका खर्च वह करे। अंग्रेजो की बनाई रिज़र्वे बैंक अभी भी चल रही पुरे देश का मनी फ्लो का नियत्रण उनके पास वरना बार्टर सिस्टम से अर्थतंत्र मुक्त था स्वावलम्बी था और वही ग्राम स्वराज था न की इतना गुलाम।
आज भी फालतू चीज़ों का व्यापार या लूंट कहे तो सब विदेशी कम्पनी, सरकारी कम्पनी या विदेशी ढंग से चलने वाली देश के पूंजीपतियों की कम्पनी की व्यवस्था चलती है। उपभोक्ता वाद की संस्कृति को विकास मान लिया गया और और बड़ी कम्पनी के प्रोडक्ट्स के गुलाम बनाया गया और बताया गया की हम आज़ाद हो गये।

