शिक्षा और जागरूता के नाम् पे ऐसा ही सिखाया जाता है कि में जागृत नागरिक हु ओर मतदान करूँगा
क्यो नही सिखाया जाता कि 70 साल से इसी नाम् पे वोट देने बाद भी कोई फर्क न पड़ा तो अब वोट ही मत दो या अपने क्षेत्र का ही मुखिया चुनलो, जिसको देखा भी न हो उसको क्यो मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनाने का??
बनाके भी क्या करेंगे वही mla ओर mp देश के पेसो से जलसे करते है, पूरी पोलिस फोर्स, सरकारी कर्मचारी तो उनके लिए बने है, उनके ऑर्डर सर आंखों पर ओर आम आदमी से तो कुत्तो जैसे व्यवहार किया जाता है तो यह केसा लोकतंत्र यह क्यो नही पढ़ाया जाता?
यह क्यो नही सिखाया जाता उनको वोट देनी ही मत जाव ऐसी जाग्रति क्यो नही लायी जाती??
जागृत नागरिक है तो टेक्स भरेंगे पर क्यो नही सिखाया जाता कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल बिना काम के हमारे मेहनत के टेक्स के पेसो से महलो में रहते है करोड़ो के खर्च करते उनकी पोस्ट का ही बहिष्कार करो।
जागरूकता के नाम् पे यह सिखाया जाता है कि सौचालय बनाओ पर यह क्यो नही सिखाया जाता कि आप के गाँव मे कोई जहरीली केमिकल फेक्टरी आने मत दो और उसमे सरकार पूरा साथ देगी पर यहां तो उल्टा है सरकार ही भेजती है जबकि सबसे ज्यादा पर्यावरण को तो वोही नुकशान करती है।
आर्थिक विकास क्या शहरों में ही हॉगा, वही मॉडल है हमारे पास ओर पढ़ लिख के ओर दिल्ही ही हम बनायेंगे। हज़ारो साल से दिल्ही खड़ी थी पिछले कुछ दसको में ऐसी पढ़ाई कर डाली के सांस लें नही शकते।
पढ़ाई सिर्फ कॉर्पोरेट के लिए उनकी व्यवस्था के बैंक मैनेजमेंट, फायनांस, बड़े मशीनों का ऑपरेशन उनका इनोवेशन, उनके लिए इंजीनियर बने, फिर कॉरपोरेट लॉ, बड़े हॉस्पिटल का मैनेजमेंट, बड़ी फार्मा कंपनी के लिए बी फार्म, ओर सरकार के हुकम मानने के लिए ओर साथ मे छोटे व्यापारी ओर आम जनता को परेशान करने के लिए कलेक्टर, पुलिश, रेवेन्यू अधिकारी। उनको बनाने के लिऐ उनकी पढ़ाई फिर इन नेता के ऑर्डर फॉलो करना ही देश की सेवा। यही सब बड़े करीयर गिने जाते है।
क्यो कृषि और पशुपालन अच्छा करियर नही गिना गया, सस्टेनेबल डेवलपमेंट तो वही है। क्यो गाव में रहे लोग ओर अर्बनायजेशन न हो वैसा नही सिखाया जाता।
हाथ पैर चले वह अच्छा कार्य क्यो नही पढ़ाया गया ओर ऑफिस में बैठे बैठे कार्य करे वह सम्मान वाला गिना गया?? जब सबसे बड़ी स्वास्थ्य की समस्या तो सिडेंटरी लाइफस्टाइल ही लाया है।
लुण्टेरे के चुनावो में पब्लिक लड़ रही है।
चुनाव से कभी देश का तो भला हुआ नही हुआ तो इन लुंटीरो को हुआ फिर क्यों इतनी दिलचस्पी लोगो मे?
दोनों के समय मे किसान आत्महत्या करता रहा। दो नो ने ही कभी बड़ी कंपनी को देश को लुंटने से बचाया नही। आलू की चिप्स जैसी मामूली चीज़ बनाने के लिए भी कपंनियों के दरवाजे खोले ओर दोनों पार्टियों ने कभी बंध करके गृहउद्योग की मोनोपोली रहे उसमे उनको रक्षण नही दिया।
दोनों पार्टियों ने कभी ITC को बोला नही की उसकी सिगरेट की फैक्ट्री बंध करे देश को नुकसान हो रहा है।
कोई भी पार्टियों ने कभी दारू कंपनी को बंध नही करवाया।
सब पार्टियों ने कभी विदेशी कंपनी को हमको लुंटने से नही बचाया। टमाटर की चटनी, अचार, जैसे घर मे बनने वाले चीज़ों को उनके हवाले कर दिया।
सामान्य घर मे बनने वाली वस्तु बड़ी कंपनी से बनायेगे ओर सुपर कम्प्यूटर, मिसाइल, हाई टेक्नोलॉजी वाली चीज हमको बनाने की।
तकनीकी क्षेत्र में मार्किट में पेटेंट लेके बड़ी कम्पनिया हमारे देश के टेलेंट का ही शोषण कर रही है। पर किसी पार्टी ने ऐसे कानून को खारिज नही किया।
कभी दोनों पार्टियों ने हमारे पर्यावरण का नही सोचा, केमिकल वाली कम्पनिया बढ़ती जाये। हमारी कृषि लायक जमीन बड़ी कंपनी को एकडॉ में दे दी कि लूंट लो।
हमारी नदियों का बचा न पाये केमिकल केे जहरीली प्रदूषण से। हमारी हवा सांस लेने लायक नही रहने दी। शहरों को बढ़ावा देके उनको बॉयलर बना डाला। कभी ग्रामीण विकास की बात नही की। ऊपर से गाव को शहर में समाहित कर दिया।
फिर भी हम बोलते रहेंगे या लड़ते रहेंगे की हमको कोंग्रेस का विकास चाहये ओर कुछ बोलेंगे की हमको भाजपा का विकास चाहये।
जबकि दोनों को विकास एक ही है गावो का विनास छोटे लोगो का विनाश, हमारी प्राकृतिक सम्पति का विनाश। उनको विकाश माने यानी देश मे फोर व्हीलर बढ़ जाये। देश मे कारखाने बढ़ जाये, देश मे लिकर कंजम्पशन बढ़ जाये। देश मे प्लास्टिक का कंजम्पशन बढ़ जाये। देश का कार्बन एमिशन बढ़ जाये।
ऐसा ही दोनों पार्टी या सब पार्टी विकास चाहती है ओर फिर भी जनता उसमे लड़ती है कि विकास कोंग्रेश करे या भाजपा।
