कांग्रेस हो या भाजप GST आने की तैयारी तो पिछले १ दशक से ऊपर चल रही थी तो यह कानून आना ही था. नरेन्द्र मोदी आते या नहीं आते GST आना तो तय था। पुरे विश्व का जो केंद्रीकरण करना हे। बड़े उद्योग और बहु राष्ट्रीय कंपनी को फायदा दिलाना हे। उनकी शाखाये १०० देश में से ज्यादा फैली हुई हे तो सब जगह लागू करवाना हे। GST 100 देश के ऊपर में लागू हो चुका हे तो क्या भ्रष्टाचार बंध हो गया।
आधीरात को आज़ादी का जश्न मनाया अभी तक आज़ादी का स्वाद सही से चख नहीं पाए. अब आधी रात को GST लाने बैठे हे उसमे पूरा भारत बहुत उत्साहित पर क्या होगा उस पे किसी का विश्लेषण नहीं हे. आधी रात की यह भारतीय संस्कृति ही नहीं हे. हम तो सूरज की किरणों के साथ कार्य की शुरुआत करने वाले देश हे, यहां की सभ्यता ऐसी हे।
जब छोटे लेवल पे सत्ता होती हे तो छोटे आंकड़ों का भ्रष्टाचार होता हे, हमारे देश में पहले से केंद्र को जयादा पावर दिया गया हे तो बड़े बड़े भ्र्ष्टाचार हुई हे अब और केंद्र को मजबूत किया अब और बड़े होंगे। इसमें नया क्या हे? यह केंद्रीकरण को तो आज़ादी से पहले अंग्रेज़ कानून बनाते थे जिससे केन्द्रीकरण मजबूत किया जाये और पूरा नियंत्रण उनके हाथ में रहे। बाद में आज़ादी के बाद नेहरू ने समाजवाद के नाम पे पूरा देश का नियंत्रण का प्रयास किया। सब लघु उद्योग को तोड़ के मेगा इंडस्ट्री में तबदील कर दिया। अब GST से काफी नियंत्रण आ जायेगा। व्यवस्था केंद्रीकरण की वही की वही हे बस नेता बदलते रहे, सत्ता बदलती रही। बुद्धिजीवीयो का विश्लेषण सत्ता परिवर्तन तक सिमित रहा नकी व्यवस्था को देश के लाभ हो उसका विश्लेषण कर पाये।
एक ही जगह जब पैसा इक्कठा होगा वह अरबो खरबो रूपया तो भ्रष्टाचार होना स्वाभाविक हे। मान लीजिए मोदी जी बहुत ईमानदार हे पर उनके बाद यही केन्द्रीकरण से लाखो करोड़ो रूपया का प्लानिंग कुछ चंद लोगो के हाथ में , उससे बेहतर ग्राम पंचायत उनकी जरूरत का टेक्स उधर से ले तो देश का पूरा कलेक्शन लाखो यूनिट में बट जायेगा और कोई अरबो रूपये का बड़ा भ्रष्टाचार हो ही नही सकता। पर अब सब बड़े चोर ही कर्रेंगे। आम आदमी या छोटा व्यापारी भ्रष्टाचार करे तो उनको चुभ रहा था। अब अमरीका जेसा सिर्फ बड़े ऊपर के लोग ही करेंगे वह भी कायदे से। सब पैसा इक्कठा एक ही जगह होगा, पूर्ण केंद्रीकरण। भाजप आये या कोंग्रेस व्यवस्था तो पूंजी वाद की हे जहा सिर्फ केंद्रकरण ही होता हे।
विकेंद्रीकरण की व्यवस्था की बात कई विद्वान ने कही उसमे महात्मा गांधीजी ने तो प्रेक्टिकल करके जन मानस को भी जोड़ दिया था। पर इस महापुरुष को भले पुरे भारत के या विश्व के बड़े विद्वान सम्मान दे चाहे वह अल्बर्ट आईन्स्टीन हो या डॉ कलाम या नेल्शन मंडेला, विनोबा भावे हो पर भारत में कुछ सिर्फ सर्टिफिकेट लेके घूमने वाले तो गाली ही देंगे, वही इन सब महापुरुषों से होशीयार फिर गांधीजी की बात कोण मानेगा।
यह लूंट व्यवस्था के बारे में कई और भी विद्वान ने भी समजाया लियोपोल्ड खोर और इ ऍफ़ शूमेकर की स्मॉल इज़ ब्यूटीफुल मूवमेंट के जरिये समजाया। मल्टीनेशनल मोनिटर पत्रिका में 20 कंपनी की बात की जो लगी हुई आर्थिक, पर्यावरण की हालत खराब करने पे। अलेक्सिस केरल भी मॉडर्न व्यवस्था की आलोचना की. सब का कहने का मतलब पुरे विश्व को पश्चिम का मॉडल देके कोई भला नहीं हुआ. उतने में एक और मॉडल आ गया GST. पिछले ७० साल से तो पश्चिम के अनेक मॉडल लिए और कोई सुखद परिणाम नहीं पाए फिर भी वही दोहराया जा रहा हे.
GST पुरे विश्व में क्यों लगाया जा रहा हे, सब देश की परिस्तिथि अलग होती हे, व्यापार अलग होते हे पर बहुराष्ट्रीय कंपनी का तरीका व्यापार करने का एक ही होता हे तो हर देश में एक जेसा ही टेक्स। उसी लिए छोटा व्यापारी निकला हे रैली में न की कोई बड़ा उद्योगपति। एंटी ग्लोबलाइज़ेशन की मूवमेंट पुरे विश्व में सुरु हुई हे। भारत में भी कुछ लोग कर रहे हे तो उनका सहयोग देना चाहिए न की उनको मुर्ख समझना चाहिए।
अब जब टेक्स सिस्टम पर इतना बवाल हो रहा हे तो में यहां कवि कालिदास का कर(Tax) के बारे में महान कथन रखना चाहता हु जो हमारी प्राचीन सूज बुज को दर्शाता हे।
"प्रजनांमेव भुत्यर्थ स ताभ्यो बलिमग्रहित। सहस्त्रगुणं ही उत्स्त्रष्टमादते ही रसं रवि:।।"
अर्थात राजा को प्रजा के कल्याण के लिए उनसे कर ग्रहण करना चाहिए जैसे सूर्य हज़ारगुना वापस देने के लिए छोटे बड़े जलाशयो से जल ग्रहण करता हे।
अब हमारे महापुरुषो और विद्वान के बुद्धिमता को समजे जिन्होंने इतनी सरल भाषा में समजा दिया की कर प्रणाली किसी होनी चाहिए इससे न सिर्फ हमारे देश का बल्कि विश्व का कल्याण करने का सामर्थ्य हम रखते हे।
अब जब टेक्स सिस्टम पर इतना बवाल हो रहा हे तो में यहां कवि कालिदास का कर(Tax) के बारे में महान कथन रखना चाहता हु जो हमारी प्राचीन सूज बुज को दर्शाता हे।
"प्रजनांमेव भुत्यर्थ स ताभ्यो बलिमग्रहित। सहस्त्रगुणं ही उत्स्त्रष्टमादते ही रसं रवि:।।"
अर्थात राजा को प्रजा के कल्याण के लिए उनसे कर ग्रहण करना चाहिए जैसे सूर्य हज़ारगुना वापस देने के लिए छोटे बड़े जलाशयो से जल ग्रहण करता हे।
अब हमारे महापुरुषो और विद्वान के बुद्धिमता को समजे जिन्होंने इतनी सरल भाषा में समजा दिया की कर प्रणाली किसी होनी चाहिए इससे न सिर्फ हमारे देश का बल्कि विश्व का कल्याण करने का सामर्थ्य हम रखते हे।
