Wednesday, 14 June 2017

किशान खतम, गाय ख़तम, छोटे उद्योग ख़तम मतलब देश की अर्थव्यवस्था ख़तम







ग्लोबलाइजेशन में ज्ञान का आदान प्रदान होना था न कि प्रोडक्ट्स का। सही मायने ग्लोबलाइजेशन हज़ारो साल से होता आया था जिसमे ज्ञान आदान प्रदान हुआ न कि प्रोडक्ट्स

WTO, IMF ओर वर्ल्ड बैंक जो बने हे बड़े उद्योगो के लिए, जो एक विश्व को बाजार के रूप में देखते हे और उसमे भारत जो की सबसे बड़ा मार्किट हे। 120 करोड़ लोग जब खून पशीने की मेहनत से इनकी प्रोडक्ट लेंगे तो इनका व्यापार तो कितना दुगना चोगना हो जायेगा। 

ऊपर से इसमें कोंग्रेस हो या भाजपा इनकी वकालत करने में पीछे नहीं हटेंगे। बड़े उद्योगों को के लिये सब सेक्टर ओपन फिर छोटे उद्योग को बोलेंगे कॉम्पिटिशन को बढ़ावा दे रहे हे। छोटा उद्योग कहा से कॉम्पिटिशन करेगा क्योंकि टीवी पे तो इसको दिन रात बड़ी कंपनी का विज्ञापन दिखा के लोगो को पागल बनाया जा रहा हे। अब यह जनता तो ब्रांडेड के चक्कर में पड गयी और छोटा कारीगर स्ट्रग्गल करने में लग गया। फिर जनता को स्वराज और सुराज चाहये। कहा से मिलेगा?

बड़ी कंपनी की बिक्री ज्यादा हो पर जो लोग गाव में बसते हे उनकी ज्यादा खपत करने की आदत नहीं होती। उनको शहर में ले आओ। लोगों को देखेंगेमूर्खता करने में, नकल करने मेंअमरीका, युरोप इनमे बहुत आगे हे तो इनसे यह लोग कुछ मूर्खता सिख जायेंगे। करोड़ो लोगों को गांव से निकाल कर शहर ले जाना है या इनको कृषि से दूर ले जाओ। ताकि इनको उद्योगिक मजदूर बनाया जा सके या कन्ज़्यूमर बनाया जा सके पूरी सिस्टम बड़े कॉर्पोरेट को फायदे के लिए बनायीं जा सके।

लेकिन सरकार किसी को धक्का दे कर तो शहर ला नही सकती, तो ऐसे आर्थिक हालात पैदा किए जा रहे हैं पिछले कई सालो से। पहले यह काम कोंग्रेस करती थी अब यह भाजप कर रही हे। उनकी हर पॉलिसी शहरीकरण के लिए ही होती हे। गांव मरे या जिये कोई निति उसके लिये नहीं बनेगी। भले विद्वान लोग कहे की भारत गांव में बसता हे।

पढ़ लिख के इतनी मूर्खता जायेगी की गाव की शुद्ध हवा छोड़ के शहर में गंदी हवा, फालतू खर्चे, स्ट्रेस भरी जिंदगी। हज़ारो बीमारिया सब मंजूर। शिक्षा नीती भी इस प्रकार की, गांव को जरूरत हो ऐसा पढ़ाया ही नहीं जायेगा। 

शिक्षा व्यवस्था भी ऐसी ही बनायेगें जो सिर्फ नौकरी का ही सोचे। सी , सी एस, एम् बी , इंजीनियर क्या करेगा गांव में उसको तो पढ़ाया ही इसी लिए जाता हे की वह शहर में किसी बड़ी कंपनी की गुलामी के लीये जाये। उसकी गुलामी करे और फिर शहर बढ़ता जाये और हर समस्या सुरु हो जाती हे।

आज से सो साल पहले ही हमने न्यूयॉर्क, टोक्यो, लंदन की नकल करना सुरु कर दिया था पर देखा नहीं की कितनी समस्या उनको हे वह हमे होगी। प्लास्टिक का उपभोग, या पुरे शहर के कचरे का निकाल या फिर उनकी बड़े गटरों का पानी और गंदकी या फिर उनके फालतू खर्चे, बड़े हॉस्पिटल, खतरनाक दवाइया वगेरा वगेरा।

अब इधर इतने साल में हो नहीं पाया तो सब कंपनी इस देश के अनऑर्गेनिज़्ड सेक्टर को तोड़ना चाहती हे। तो डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, कॉर्पोरेट फार्मिंग को बढ़ावा देने पर, जी एम् फसलों को बढ़ावा देने पर... GST आपके सामने है, कैशलेस आईडिया आपके सामने है, आधार सिस्टम पर हो रहे डेवलपमेंट्स आपके सामने है।

सब नियम बना दो कंपनी के लिये किसान अब बिज नहीं बनायेगा उसकी विकेन्द्रित सीसटम हे वह खत्म कर दो किसी कंपनी के लिए। बीज हमारे लिए धरती माॅ की ऐसी अनुपम भेंट है, जिसके आधार पर हमारी संस्कृति हज़ारो वर्षों से लगातार आगे बढ़ रही है। हमारी संस्कृति में बीज/अन्न को वस्तु न मानकर पवित्र और प्राणों का आधारमाना गया है। बीज किसानो का और हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, जीवन-पर्यंत हम इसकी रक्षा करते रहेंगे!

अन्नं हि धान्य संजातं धन्यं कृष्या विना न च।
तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत् ।।7।। कृषि पराशर।।

भावार्थः बीजों से अन्न की प्राप्ति होती है। अन्न से हमें भोजन मिलता है। भोजन से हमारे प्राणों की रक्षा होती है। बीज के बिना खेती करना सम्भव नहीं है, खेती के बिना अन्न उत्पन्न नहीं हो सकता। बिना अन्न के जीवित नहीं रहा जा सकता। अतः कष्ट सहकर भी यत्नपूर्वक खेती करनी चाहिए।



फिर छोटे उद्योगों में SME सबसे ज्यादा अपना योगदान दे रहा हे अर्थ तंत्र में उसको कॉम्पिटिशन करवाओ बडे उद्योगो से जिसके विज्ञापन बजट ही करोड़ो के होते हे। छोटे लोग अपना प्रोडक्ट ही बेच पाये और बड़ी कंपनी गाँव गांव में घुस जाये। सबकी जेब में से पैसा कुछ गिनी चुनी कंपनी के पॉकेट में ही जाये। फिर कोई इंटेप्रेन्योर नहीं बनेगा, सब गुलाम बनेंगे कॉर्पोरेट के।

MNCs को चाहिए उनका मार्किट... कृषि करने की स्वतंत्रता समाप्त करो...Monsanto_bayer, Du-pont जैसों के लिए बाजार भी बनाना है, ये ही GM बीज fertilizer, pesticide, insecticide के एकलौते ठेकेदार बनाए जाने हैं ... international level पर कानून जैसे GATT या फिर अब WTO है। किसान स्वतंत्र रूप से अपने बीजों का उपयोग नही कर सकता, बीजों को फसल दर फसल प्रयोग नही कर सकता, वजह दी जा रही है कि इससे बीजों की नस्ल develop नही कर पाती

मतलब बिज का कंट्रोल अब बड़ी कम्पनिया करेगी। जो अन्न का सोर्स हे उसीका का कंट्रोल। गांधीजी को यह का श्रृंद्धाजलि दी जा रही हे। वह सब चीज़ का वेकन्द्रिकरण चाहते थे। यहाँ तो हर चीज़ का केंद्रीकरण। टेक्स का केंद्रीकरण, बिज का केंद्रीकरण।

सब की भलाई को उधर पार्लियामेन्ट ही निर्णय लेगा। सिधि बात हे उसमे किसी की भलाई तो नहीं होगी पर उन चोरो की तो जरूर होगी और जिनके लिए वह चमचागिरी करते हे उनकी भलाई के लिए सारा जाल बिछाया जा रहा हे।

हर चीज के लिए MNCs पर निर्भर हो तो फिर स्वराज काहे काfood security इनके हाथ मे दे दो...बाद में कब खिलाना और कब भूखा रखना यह तय करेंगे।जीनकी खरीदने की औकात होगी वह खायेंगे बाकी पूरा देश भूखा सो जाये उनको क्या। इंसानियत और मानवता के ऊपर नंगा नाच जो यह नाचेंगे।

देशी बिज का सिलशिला इस देश में हज़ारो साल से चल रहा था। कभी कोई आपत्ति नहीं आयीं, विकास नहीं रुका अब रुक गया। जब देश कृषिप्रधान होके भी सोने की चिड़िया था वेसे कोई पॉलिसी नही करनी, सब पे कुछ लोगो का कंट्रोल करवा दो पहले यह कंट्रोल समाजवाद के रूप में सरकार ने किया अब पूंजीवाद के नाम पे कुछ उद्योग करेंगे। 

उच्च पैदावार का दावा किया जा रहा है, जब न्यूयॉर्क टाइम्स ने संयुक्त राष्ट्र  और अमेरिकी कृषि विभाग के आंकड़े का इस्तेमाल करके अध्ययन से यह  निष्कर्ष निकाला कि दुनिया में कहीं भी जीएम फसलों से प्रत्यक्ष पैदावार में कोईलाभ नहीं दिखा है। इससे केवल यही साबित होता है कि भारत में जीएम फसलों को लेकर जो दावा किया जा रहा है, वह झूठा है। 

अब जरा खाद्य तेल के आयात बिल पर नजर डालिए वर्ष 2015 में भारत ने 66 हजार करोड़ रुपये के खाद्य तेल का आयात किया, जो  कुल खाद्य तेल जरूरत का लगभग 60 फीसदी है।  खाद्य तेल का इतना ज्यादा आयात इसलिए नहीं हुआ कि तिलहन की फसल कमजोर हुई। जो बात लोगों की निगाह से छिपाई गई, वह यह कि 1993-94 में खाद्य तेल के मामले में भारत आत्मनिर्भर था, जो अपनी जरूरत का करीब 97 फीसदी तिलहन का उत्पादन देश में ही करता था। उसके बाद ही देश ने आयात शुल्क घटाना, सस्ते आयात को अनुमति देना और आयात बढ़ाना शुरू किया। 300 फीसदी आयात शुल्क की स्वीकार्य सीमा से धीरेधीरे इसे घटाकर शून्य पर लाने में भारत सक्षम हुआ। यहां तक कृषि मंत्रालय और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने कई बार इसे गलत व्यापार नीति बताकर चेताया, लेकिन इसके प्रभाव की तरफ इशारा नहीं किया। तब खाद्य तेल के  उत्पादन में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे आयात पर निर्भरता बढ़ी थी।

अध्यंयन के लिए वर्ष 2014 और 2015 में उत्तर ओर मध्य भारत में खु ले बाज़ार  से बीटी कपास के बीजों के पैकेट खरीदे गए थे। बीटी के जीन्स2 की मौजूदगी का पता लगाने के लिए के इन बीजों के नमूनों का डीएनए टेस्ट किया गया और नागपुर के केंद्रीय कपास शोध संस्थागन में किए गए फील्डइ ट्रायल के जरिये इन दोनों फसलों के बीजों के अंकुरण एवं उनके क्रमिक विकास की पड़ताल भी की गई। अध्य्यन के अनुसार बीज कंपनियों द्वारा रिफ्यूज के लिए उपलब्धं कराए जा रहे बीज निर्धारित मापदंडों पर खरे नहीं उतरते हैं।



जनहित की बात ही नहीं बस कुछ लोगो के हित की ही बात होगी और वह तय कुछ लोग ही करेंगे देश की नीतियों के नाम पे। अब एक ही हथियार हमारे पास बचता हे। असहयोग(Non-Coopration) और बहिष्कार(Boycott).

ज्यादा से ज्यादा हमारे आसपास की लोकल वस्तु का ही उपयोग करे उधर ही पैदा होती वस्तुओ का प्रयोग करे। बड़े उद्योग को सम्पूर्ण असहयोग करे बहिष्कार करे।

किशान से जितना हो, छोटे व्यापारी से जितना हो उतना ले। मिडयेटर चेन को हटाये। वह छोटा हे तो इतनी मिलावट नहीं आयेगी आप प्रत्यक्ष देख भी पायेंगे जबकि बड़ी कंपनी आपको कोनसा जहर देती हे आप देख भी नहीं सकते।


સ્વાસ્થ્ય સંવાદ

સ્વાસ્થ્ય સવાંદ ગ્રુપ ની તારીખ 18 - Aug - 20, સાંજે 8.30 થી 10.00 વાગ્યા સુધી સ્વસ્થ કેમ રહેવું અને આહાર વિહાર માં જે કાળજી લેવી એના પર હું ...