Friday, 24 March 2017

स्वदेसी - तुलनात्मक विश्लेषण

आज जब ऑफिस से घर आ रहा था की देखा, ऋतू के हिसाब से एक भाई फल बेच रहा था रायन और सेतुर जो गुजराती भाषा में कहते हे इस फल को।

जो सड़क पे खड़े थे लोगो को बुला रहा थे पर कोई कार वाला या बाइक वाला उनको भाव नहीं दे रहा था।

अब यह उनका दुर्भाग्य बोलू या देश का जहा क्वालिटी प्रोडक्ट बेचने के लिए इनको इतनी मेहनत करनी पड़ती हे वही दूसरी और जंक फ़ूड का जहर बेच के साल का दस हज़ार करोड़ के आसपास सेल्स करते हे।

दिमाग तो तब चक्कर खा जाता हे की इनको इस जहर को बेच ने के लिए बुलाना नहीं पड़ता लोग सामने से फ़ोन पे ऑर्डर देते हे या लाइन में खड़े रहते हे।

सेंटर फॉर सायन्स एन्ड एन्वायरमेंट की रिपोर्ट हे की कितनी बीमारिया जंक फ़ूड से आती हे। फिर भी खाने वाले ज्यादा पढ़े लिखे लोग हे जिन्होंने सिर्फ डिग्री के नाम पे कागज का टुकड़ा लिया हे बाकी उनकी मूर्खता का कोई अंदाजा नही लगाया जा सकता।

वेसे ही पेप्सी और कोको कोला तकरीबन 12 हज़ार करोड़ का सेल्स करते हे। जबकि दुनिया भर में उसके खतरनाक दुष्परिणाम पाये गए हे।

अब हमारे देसी फल खाने में लोगो को पिछड़ापन लगने लगा हे। भले ही वह पूर्ण वैज्ञानिक हो जिसकी न्यूट्रीशनल वेल्यु की कोई कम्पेरिजन न हो।

फिर खाना खाना हो तो जहर खाओ यह पढ़े लिखे गवारों का मॉडर्निज़्म हे।

मैकोले का शिक्षण और उसका प्लान पूरा सफल रहा की एक दिन भारतीय लोग ही अपने आप को पिछड़ा समजेंगे।

उनको क्वालिटी विदेशी चीज़ों में ही नज़र आती हे भले ही वह जहर हो या घटिया से घटिया क्वालिटी।

पिछले दिनों मेरा एक्सिडेंट हो गया, विदेशी दवा का जहर पता हे मुझ को उसी लिए मेने तो लिया नहीं पर सेलाब आ गया मुझे समजाने को की डॉक्टर को दिखाओ मतलब में यमदूत को दिखाऊ।

साइड इफ़ेक्ट वाली दवा देता उससे बढ़िया मेरे देश की जडीबुटी सिर्फ अदरख, लॉन्ग, हल्दी ने कमाल कर दिया बिना ज्यादा शारीरिक तकलीफ बिना ही ठीक कर दिया।

अब कोई बता दे हमारे किचन में जो मसाले रहते हे उनकी क्वालिटी का कोई तोल ही नहीं हे और इसमें मुझे कुछ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं हे। बड़े बड़े विश्व प्रसिद्ध डॉक्टर ने अपने पुरे अनुभव से बात कही हे।

यहाँ में ऐसे ही एक विश्व प्रसिद्ध जो हावर्ड के प्रोफसर थे उनकी बात रख रहा हु।

 "If all the medicine in the world were thrown into the sea, it would be bad for the fish and good for humanity"  O. W. Holmes, (Prof. of Med. Harvard University)

अब यह कहते हे की दुनिया की सब दवा समुंदर में फेक दो तो मानवता के लिए सबसे अच्छी बात होगी पर मछलीयो के लिए नहीं।

अब ऐसे एक दो प्रोफसर नहीं सेकंडो प्रोफेसर या डॉक्टर हे जो यह बात बोल रहे हे।

आप इवान एलिच की मेडिकल नेमेसीसी देख लीजिए या एलेक्सिस केरल की मेन धी अननोन पढलो जिससे पता चले की मॉडर्निटी ने क्या दिया।

डॉ बी एम् हेगड़ेजी को सुन लीजिए मॉडर्न मेडिसिन पे।

इन सब ने बहुत बड़ी बात कहदी फिर हमारे पढ़े लिखे मूर्खो को विदेशी चीज़ों में क्या क्वालिटी नज़र आती हे। जो मेरी देश की चीज़ में नहीं आती हे।

अब विश्व आरोग्य संस्था (WHO) का कहना हे की 80 प्रतिशत लोगो इलाज पारम्परिक चिकित्सा से होता हे।

पूरी दुनिया को कपड़ो पहनांना हमने सिखाया फिर भी डेनिम जीन्स के पीछे या कोई अन्य लूंटने वाली आर्थिक तरह से चूसने वाली कंपनी की प्रोडक्ट खरीदना चाहते हे। जीन्स जल प्रदूषण को बढ़ावा देता हे पर पढ़े लिखे लोग ही उसको ज्यादा पहनते हे। भारत के गांव में बुजुर्ग तो आज भी भारतीय पोशाक जो पूर्ण वैज्ञानिक हे वही पहनते हे।

खादी सो गुना अच्छी हे पर नहीं पहनेगे क्योंकि वह पहन ले तो उनकी मूर्खता देखेगी कैसे।

एक से एक बढ़िया कपड़े बनते हे यहाँ। में चित्तौड़गढ़ गया उधर कस्टर्ड एपल के फाइबर की साडी बनाते हे। बनाना फाइबर की साडी बनाते हे। वेसे ही आगरा में लेमन ग्रास के फाइबर की चादर बनती हे और ऐसे तो हर क्षेत्र की अपनी विशेषता हे। 

गांधी को गाली देने पीछे नहीं हटेंगे क्यों? क्योंकि गांधी ने देश को बर्बाद कर दिया उनको गुलामी से मुक्त करवा दिया लोगो को तो आज भी ब्रांडेड के नाम से विदेशो की गुलामी करनी हे और उसपे गर्व भी तो करना हे।

वह गांधी का चरखा और हैंडलूम सेक्टर आज भी करोडो का रोजगार दे रहा हे।

जो दुनिया की कोई बड़ी से बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी नहीं दे पाती लोगो का खून चुस्के भी।

खून भी इसी लिए चूस रहा हे क्योकी हमारी मरजी हे।

हमारे मुंह में दवा नहीं ठूस रहा, जंक फ़ूड भी नहीं ठूस रहा। जबर जस्ती न कपड़े पहना रहे हे। न आपके घर में ओवन रख रहे हे जिसका खाना खाके आप को केंसर हो या न आपके घर आके फ्रीज़ या ऐसी रख जाते हे जिससे क्लोरो फ्लोरो कार्बन फेले हवा में आपके फेफड़े बिगड़ जाए आपकी साँस लेना मुश्किल हो जाये।

यह आप ही कर रहे हो आधुनिक दिखने के लिये या फिर स्वदेसी में क्वालिटी नहीं होती इसी लिए विदेशी चीज़ ली इसे मुर्ख भरे स्टेटमेंट बोल पाओ।

सुबह उठ के जहर वाला टूथपेस्ट मुह में घिसना दातुन या दंत मंजन जेसी सही मायने में ओरल हेल्थ क्वालिटी प्रोडक्ट्स की जगह।

फिर लोगो को बोलना की विदेशी जहर जेसी स्वदेसी प्रोडक्ट्स में क्वालिटी नहीं होती और शाम को सुते समय तक खतरनाक मच्छर अगरबत्ती लगाके अपना पैसा बड़ी कम्पनी को देना, स्वास्थय की बरबादी, पर्यावरण की बबार्दी।

अगली सुबह में इंटेलेक्च्युल बोलना की सरकार देश को बर्बाद कर रही हे तो हम कहा पीछे हट रहे हे।

सरकार तो हे ही दलाल पर आप भी बड़े चोर कंपनी को बड़ा बनाने में कहा पीछे हटते हे।

भारतीय इंजीनयर छोटी कंपनी एक्सपोर्ट करते हे। आईआईएम अहमदाबाद के एक प्रोफेसर का प्रेसेंटेशन तो कहता हे 50% एक्सपोर्ट होता हे।

राजकोट की कितनी कम्पनि एक्सपोर्ट करती हे पर इनको विदेशी प्रोडक्ट् में ही क्वालिटी दिखती हे।

सबसे ज्यादा रोजगार लघु उद्योग ही पैदा करता हे। पर इनको लगता हे की मल्टी नेशनल कंपनी ही रोजगार देती हे।

देख लीजिए जनरल मोटर्स को एक झटके में ही हज़ारो की तादाद में लोगो को बेरोजगार बनाके चली गयी।

आज जब बैंक आप के पैसे उठाने पर पैसा काट रही हे तो आप ही हे ना जो लोकल कोऑपरेटिव का खाता बंध किया उसे चोर समज कर और बड़े चोर को और बड़ा ताकत वाला चोर बनाया।

स्वदेसी की भावना कोई स्वार्थी भावना नहीं हे पर प्रकुति के साथ तालमेल ही हे। आप अपने क्षेत्र का ही उपयोग कीजिए जो प्रकृति ने बनाया जो आपके क्षेत्र के लोगो ने बनाया इससे उनका घर चल जायेगा नहीं के करोडो लूंटने वाली कंपनी की तरह हर देश पे उनका सामज्र्य स्थापित होगा।

पर आज तो स्वदेसी की व्याख्या भी विदेशी कर डाली। स्वदेसी का मतलब गांधीजी ने सरल शब्दइ समजाया की शोषण रहित व्यवस्था। जिसमे उसी क्षेत्र या गाँव के लोगो द्वारा जरूरी सामान का उत्पादन हो और खपत हो।

पर यहाँ तो स्वदेसी कंपनी मतलब उसका मालिक भारत का होना चाहिए यही स्वदेसी कर दिया। भले ही वह शोषण करे लोगो को बिन जरुरी सामान बेचे फिर भी स्वदेसी।

और एक ही कंपनी सब गावो को बेचे उनका मुनाफा बटोरे यह कहा स्वदेसी हो गया।

गांधीजी को लोग गाली देते होंगे तब वह कम दुखी होते होंगे पर ज्यादा दुखी तब होते होंगे जब उनके राष्ट्रवादी विचार की रोज हत्या होती हे। जब भारत की जनता ही अपने आप को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ती हे।

गांधीजी ने हर गांव को स्वावलम्बी होने की बात की यहाँ तो पुरे देश को परावलम्बी बनाने में हम कोई कसर नहीं छोड़ते और फिर होशियारी लोग इस बात की मारते हे की इम्पोर्टेड चीज़ का उपयोग कर रहे हे।

भले ही वह उसके स्वास्थय को, पर्यावरण को, अर्थतंत्र को तोड़ डाले उसको लूंट ले पर इनको इसी में मज़ा आता हे

સ્વાસ્થ્ય સંવાદ

સ્વાસ્થ્ય સવાંદ ગ્રુપ ની તારીખ 18 - Aug - 20, સાંજે 8.30 થી 10.00 વાગ્યા સુધી સ્વસ્થ કેમ રહેવું અને આહાર વિહાર માં જે કાળજી લેવી એના પર હું ...