हमको कई सेंकडो साल से यही पढ़ाया गया की हम पिछड़े हुई थे। हम आदिवासी थे। अंग्रेज आये तो उन्होंने विकास किया।
इसको हमारे हर महापुरुष ने कड़ी निंदा की वह स्वामी विवेकानंद और या श्री औरोबिंदु, लोकमान्य तिलक से लेकर महात्मा गांधीजी ने।
किन्तु खेद की बात यह हे की हमारी जनता को इन महापुरुषों की बात सुनने का समय ही नहीं हे। क्योंकि इनके लिए महापुरुष बन चुके हे सचिन तेंदुलकर या अमिताभ बच्चन। अब इन महापुरुष का कार्य ही ऐसा ही जो मनोरंजन से लेनादेना रखता हे नाकि देश की समस्या और उसके हल।
भारत की समस्या का अर्थ हे की हमारे लोगो की समस्या जिसका समाधान हमारे खुद के तरीके से ही निकाला जा सकता हे न की अमरिका का मॉडल अपनाओ या जापान का या रशिया का या ब्रिटिन का। यह सब तो हम पिछले कई दसको से कर के देख चुके हल तो मिले नही समस्या और बढ़ी। वह तो बढ़ने ही वाली थी क्योंकि वह अंधी दौड़ थी। जिस देश को या उधर के किसी बुद्धिजीवी का हमारे देश से कोई लगाव न हो और उसका सुजाया रास्ता हम अपनाये तो जाना कही हे और रास्ता कोई और पकड़ा वेसी बात हो गई जिससे मंजिल तो कभी मिलेगें ही नहीं।
हमारे देश के महापुरुष थे जिन्का इस देश के लिए गहन चिंतन था लगाव था उनकी ज़रा सोच ली होती और यह बात महात्मा गांधी से लेके हम कई हज़ार साल पिछे चले तो हमारे ऋषियो ने इतनी बड़ी व्यवस्था का निर्माण किया था की सम्पूर्ण ससटेनबल डेवल्पमेंट बात की थी और हज़ारो साल यह परम्परा चली।
पर यह समजाये कोण, सिखाये कोण हमको तो यही सिखाया गया की हमारे ऋषियो ने कुछ धार्मिक किताबे ही लिखी थी। संस्कृत की इतनी अवगणना की गयी की आज मुझे मेरा हज़ारो साल का इतिहास पढ़ना हो तो मुझे अंग्रेजी का अनुवाद पढ़ना पड़ता हे।
प्राचीन भारतीय विज्ञानं पे आधुनिक संसोधन और विचार:
हमारे ऋषियो ने नाकि धार्मिक ग्रंथो की रचना की पर सूक्ष्म विज्ञानं का अवलोकन किया और दुनिया की सबसे बेहतरीन सिस्टम बनायीं और यह में नहीं कह रहा विश्व के विकसित देश में हुई रिसर्च ही कह रहे हे।
जेसे एक उदाहरण देता हु, प्लास्टिक सर्जरी जो अड्वान्स मेडिकल साइंस गिना जाता हे उसका सबसे पहले एप्लीकेशन मेरे देश में होता था और वह महान ऋषि जिसने यह सिस्टम बनाया वह मह्रिषी शुश्रुत के बारे में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, अमेरिका का हेल्थ इंस्टिट्यूट भी बोल रहे और न जाने कितने और भी हे।
इस संस्कृत में तो यह लिखा हुआ हे की "यतोभ्युद्यनिश्रेयसिद्धि: स धर्म" अर्थात जो उन्नति करता हुआ परम् उन्नति तक ले जाये वह धर्म हे।
इससे यह ज्ञात होता हे की धर्म का मतलब आज जो बिद्धिवादि सोच रहे हे उतना संकुचित नहीं था।
मनुस्मृति में तो महायंत्रो का निर्माण ही वर्जित कर दिया गया। इससे यह भी पता चलता हे की महायंत्र तो होते होंगे पर वह सही विकास में बाधक रूप होते होंगे इसी लिए हमने उसका उपयोग सही न समजा और यही बात हमारे देश में महात्मा गांधीजी ने फिर से दोहराई थी।
गांधीजी ने कहा था की बड़े यंत्र पूंजी वादी को अधिक समृद्ध बनायेंगे थोडा रोजगार उत्पन्न करेंगे पर लाखों लोगो को बेरोजगार या दिशाहीन बना देंगे। वही हम देख रहे हे। छोटे उद्योग जितना रोजगार उत्पन्न कर रहे हे वह बड़े उधोग इतना पूंजी लगाके भी नहीं कर पा रहे हे ऊपर सम्पति केंद्रीकरण हो रहा हे। अर्थव्यवस्था पूरी केंद्रित कुछ लोगो के हाथ में हो रही हे और सरकार लाचार हे।
दुर्भाग्य की बात हे की जिस देश का स्वदेसी विज्ञान इतना विकसित हो उसी देश को लोग भूल कर, उसकी उपेक्षा कर दूसरे देश की सामान्य तकनीक को समस्त संसार की लिए भय प्रकट कर रही हो उसको अपनाने के लिए पागल बन रहे हे।
प्राचीन भारत की उत्कृष्ट तकनीक का एक उदाहरण देता हु। संस्कृत के विद्वान श्री सुब्रहन्य अय्यर को पुराने हस्त लिखित ग्रन्थ की खोज करते दक्षिण भारत में कर्नाटक एक ग्रँथ मिला
ग्रन्थ को पढ़ने और उसमे वर्णित विषय को समझने में कठोर परिश्रम लगा। शाश्त्रीय (scientific) विषय होने का कारण विशेष कठनाइ हुई। उस ग्रन्थ में कई प्रकार की मिश्रित धातुओं का वर्णन दिया गया था। वह मह्रिषी भारद्वाज के विमानशास्त्र में वर्णित विभिन्न प्रकार कद लोहे के अनुसार पाये गए। इसमें आगे संशोधन के लिए श्री अय्यर ने भारत सरकार के नेशनल इनफार्मेशन विभाग के तकनीकी अधिकारी श्री सी एस आर प्रभु को सम्पर्क किया। सयोंग से श्री प्रभु भी भोजपत्रों पे लिखे संस्कृत गर्न्थो का अध्ययन कर रहे हे थे। उनको अपने एक ग्रन्थ में धातुओं बनाने का विधियो का एक ग्रन्थ मिला। इनको परीक्षण में विमान निर्माण के लिए उपयोगी पाया गया। इसके बाद प्राचीन विधियों के अनुसार कई प्रकार की मिश्रित धातुओं के नमूने बनाये गए। इनके विषय में श्री प्रभु ने शोध पत्र भी प्रकाशित कर चुके हे।
अब भारत ही नहीं इन पर कैलिफोर्निया के एक विश्वविद्यालय में भी परीक्षण कार्य हुआ।
भारतीय भौतिक ज्ञान हज़ारो साल पुराना हे। जिसमे आज के भौतिक शास्त्र के हिसाब से उसमे कोई विभाजन नहीं था। जेसे ताप, प्रकाश, विद्युत, ध्वनि आदि।
पर हर पदार्थ में चेतना हे उस स्वरुप से देख गया और प्रयोग विश्व समाज और पर्यावरण को ध्यान में रख के ही किया गया। जहा जिस के दुष्परिणाम नज़र आये उधर वर्जित कर दिया गया।
पेड़ो को न काटना, उत्तर में सर न रखना, वगेरा। ईशावास्योपनिषद का श्लोक बहुत सहायक हे।
ईशा वास्यामिदम सर्व यत्किज्चि जगत्यां जगत।
तेन त्यतकें भुज्जीथा माँ गृधः कस्य स्विद् धनम्।
अर्थात अखिल विश्व ब्रह्मांड में जो कुछ भी चराचार जगत हे उन सबमे में चेतना का वास हे। या फिर मुले ब्रह्म, त्वचाविष्णु; शाखायाज्च महेश्वर:।
पते पते देवानाम, वृक्ष राज नमोस्तुते।।
आज के आधुनिक समाज से कही ज्यादा हमारे पूर्वजो ने पेड़ पौधों को सम्मान और रक्षण दिया होगा, यह इस श्लोक से प्रतिपादित होता हे।
आधुनिक युग के अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक मानने लगे हे।
नोबल पुरुष्कार विजेता डॉ ज्योर्ज वाल्ट का कहना हे की भौतिक जगत में चेतन शक्ति का अस्तित्व का स्वीकार करके अनेक वैज्ञानिक गुत्थियों को शुलझाया जा सकता हे।
भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर यूजेन बिगनर चेतना का सहारा लिए बिना क्वांटम मैकेनिक्स को नहीं समजा जा सकता।
मह्रिषी भारद्वाज के विमान शाश्त्र में वर्णित तमोगर्भ लोह, पंच लोह, चपल ग्राहक लोह, वधिरलोह, विद्युत दर्पण आदि हे। सबकी अपनी विशिष्टता हे।
अल बरुनी भारत की यात्रा दौरान यह कहते हे की ब्रह्मगुप्त ने कई सदियों पूर्व लिखा :पृथ्वी का गुण है आकर्षित करना और वस्तुओं को धरातल पर बनाये रखना।जल की प्रकृति है बहना ,आग का गुण जलाना है और वायु का मुख्य प्रकृति है गति।किसी भी प्रकार का बीज इसे किसी भी दिशा मे फेंका जाये हमेशा फल देता है ।
आधुनिक चिकित्सा प्रणाली:
ऐसे ही आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के कुछ आंकड़े रखता हु। विश्व आरोग्य संस्था (WHO - World Health Organization) के रिपोर्ट अनुसार 10% सबसे गरीब देश में बीमारी जो मृत्यु का कारण हे। जबकि 30% मध्यम अमीर देश और 20% सबसे अमीर देश के लोगो की मौत का कारण बीमारिया हे।
अब सबसे बडि आश्चर्य की बात यह हे की दुनिया के सबसे अमीर देश में बीमारियों से मौत का कारण को गरीब देश से दुगना हे। जबकि वहा सबसे विशालकाय फार्मा कंपनी, बड़े अस्पताल, हाई टेक मेडिकल सिस्टम हे।
जबकि गरीब देश के पास उनका पारम्परिक ज्ञान ही हे जिस से वह दवा करते हे।
आंकड़ो के अनुसार देखे तो यह पता चले की आधुनिक चिकित्सा प्रणाली से बेहतर तो पारम्परिक ज्ञान लोगो को मौत से ज्यादा बचाता हे। तो पुरे दुनिया में एलोपैथी का डंका क्यों बज रहा हे और क्यों सरकार भी उसको प्राथमिकता दे रही हे। यह प्रणाली पुरे दुनिया में जरूर नहीं तो फिर बड़ी कंपनी के साजिश ही हे यह अनुमान सामान्य बुद्धिजीवी भी कर सकता हे।
अब लोगो में तो यही भ्रमना हे की विकसित देश यानी अमेरिका और यूरोप तो स्वर्ग समान हे। उधर कोई समस्या ही नहीं उधर से ली गई सारी व्यवस्था दुनिया की समस्या दूर कर देगी। पर सत्य यह नहीं हे। लोगो में जानकारी का अभाव हे। उसी लिए यहाँ कुछ सही जानकारी रख रहा हु।
अधिक विकसित देशों में जन स्वास्थ्य की दर अंत्यंत न्यूनतम है| स्वास्थ्य सर्वे के आधार पर ये पाया गया की
बड़े शहरों में सभी व्यक्ति पीड़ित हैं किसीको रक्तचाप की समस्या है तो किसी को दिल की परेशानियाँ या मधुमेह से ग्रस्त है कोई | शायद ही ऐसा कोई मिलेगा जिसने डॉक्टर से सलाह न लेता या जिसने कोई शल्य चिकित्सा नहीं करवाई| अपराध की दर बहुत बढ गयी है यहाँ | नित्य अपराध के नए तरीके खोजे जाते हैं | स्कूल के बच्चे तनावग्रस्त होकर अपने सहपाठियों पर गोलियां चलाकर शिकार बना रहे |
प्रोफ़ेसर आइसेंबर्ग एक अमेरिकी चिकित्सा विशेषज्ञ कहते हैं की अमेरिका में पूर्ण स्वस्थ कोई नहीं है| अमेरिकन स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार सभी में कोई न कोई विकृति है|
स्वास्थ्य रक्षा और आधुनिक चिकित्सा
आम लोगों में एक भ्रम है की लोगों के स्वास्थ्य के डॉक्टर और चिकित्सालय अत्यंत जरुरी है.| जबकि तथ्य ये भी है कि अस्पताल और डॉक्टर का समाज के स्वास्थ्य को ख़राब करने में बड़ा योगदान है | हमारा शारीर बहुत ही गतिशील है | ये प्रकृति के नियमों से संचालित होता हैं और ये प्रकृति स्वयं में बहुत ही गतिशील है |
मानव शरीर एक स्वमेव इम्यूनो विकार प्रणाली है जो की पूर्णतया प्राकृतिक हैं | चिकित्सीय हस्तक्षेप इसे विकृत कर देता हैं और स्वास्थ्य को बिगाड़ देता है | यदि यह हस्तक्षेप जारी रहता है तो भविष्य में समुचित विकास सिद्धांत की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है अर्थात भविष्य में मानव शारीर में विकृतिया आ सकती हैं|
जब इस्रायल में डॉक्टरों ने हड़ताल की तब लोगों के अस्वस्थ्य होने और मृत्युदर दोनों में बहुत ही गिरावट दर्ज की गई|
हमको और एक चीज़ बतायी गई पढाई गई की मांसाहार जरुरी हे। उससे पोषण मिलता हे। स्वस्थ रहते हे। अब यह कितना बड़ा जूठ हे यह में नहीं पर एक विशेसज्ञ की बात से पता चलता हे।
डॉ जे Oldfield, वरिष्ठ फिजिशियन, लेडी मार्गरेट अस्पताल, लिखते हैं: ये अकाट्य सत्य है की शाकाहार में वो हर तत्व मौजूद है जो मानव की सभी जरूरतों को पूरा कर सकता हैं | मांस अप्राकृतिक भोजन है जो शरीर में विभिन्न विकार उत्पन्न करता है| इससे मानव अनेक रोगों जैसे कैंसर ,ज्वर और पेट के कीड़े से संक्रमित हो जाता है| मांस भक्षण पैदा होने वाले १०० मेसे ९९ लोगों में रोगों का गंभीर कारन है |
मांस खाना और शराब का सेवन दोनों एक जेसे ही हैं| शराब की लत स्वाभाविक मृत्यु की तरह है जब मांस हटा दिया जाये| जन्म नियंत्रण उन लोगों में कठिन है जो मांस खाते हैं| मानसिक नियंत्रण मास्भ्क्शियों में एकदम असंभव है | देखो की बाघ जो मॉस खता है कितना क्रूर है और हठी और गाय जो शाकाहारी है कितने शांतिप्रिय हैं| मांसभक्षण बुध्दी पर सीधा बुरा असर डालता है| मांस खाने वाले देशों में कैंसर से मरने वालों की संख्या अधिक हैं| पश्चिमी देशों में डॉक्टर मरीज को शाकाहार पर रखते हैं और वो जल्दी ही ठीक हो जाते हैं|
आधुनिक अर्थशास्त्र:
कई दसको से लोगो को यही बताया गया की पश्चिम के देश विकसित हे और बाकि अल्प विकसित और उनका विकास दूर करने के लिए विश्व में बड़ी संस्थाये बनायीं गई जेसे WTO, IMF और उसके बाद ऐसी अंधी दौड चली के हर सरकार, बुद्धिजीवी वर्ग यही मानने लगा की उनकी बिना विकास नहीं हो सकता। आज कुछ दसको की बाद उनकी नीतियों पे चलके क्या प्राप्त किया वह देखते हे।
CATO द्वारा उपलब्ध करवाई गई पुस्तक जो विश्व की बड़ी संस्थान का पर्दाफाश करती हे।
गरीबी बनाये रखने में
विश्व बैंक और IMF का योगदान
तीसरी दुनिया अर्थात विकासशील देश गरीब माने गए क्योकि कहा गया की उनके पास पूंजी नही है इसलिए वे गरीब है।
इस पूंजी की कमी को दूर करने के लिए ये हल दिया गया की इन देशों मे विकसित देशों से धन भेजा जाये। चूंकि निजी क्षेत्र यहाँ समृद्धि लाने मे अनिच्छुक और असमर्थ माना गया इस कारण से सरकारों को अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए आगे आना पड़ा।
विदेशी धन अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएगा। दुर्भाग्यपूर्ण 40 बर्षों मे भी इस विदेशी ऋण की मदद ने इन देशों की कोई मदद नही की अर्थात कोई सुधार न हुआ और इसके विपरीत गरीबी बढ़ गयी।
इसका एक कारण ये भी था की इन राष्ट्रों की समस्या धन के अलावा और भी थी । धन स्थान्तरण का सिद्धान्त कुछ विकसित देशों की संस्थाओं द्वारा तैयार त्रुटिपूर्ण विकास मॉडल की देंन था।
विश्वबैंक और IMF जैसी संस्थाओं ने गरीब देशों को धन सहायता के रूप मे ऋण देना जारी रखा और ये राष्ट्र गरीब होते गए और अर्थतंत्र बीगड़ गया।
स्मॉल इज बुटिफूल अर्थशाश्त्र का एक अध्ययन निवंधों का संग्रह है जो बिटिश अर्थशाष्त्री ई ऍफ़ शुमाकर ने लिखा|
स्मॉल इज बुटिफूल में शुमाकर द्वारा पश्चिमी अर्थशास्त्र पर लिखी एक आलोचना है जो १९७३ में ऊर्जा संकट और वैश्वीकरण का उदय के दौरान |
शुमाकर तर्क देते है की आधुनिक अर्थव्यवस्था अस्थिर है | प्राकृतिक संसाधन (जीवाश्म) को आय बढाने वाला समझा जाता है जबकि उन्हें पूंजी माना जाना चाहिए क्योकि वे नवीकरणीय नहीं है और कभी भी समाप्त हो सकते हैं| प्रकृति की प्रदुषण को नियंत्रित करने की क्षमता बहुत सीमित है|सरकार को रचनात्मक विकास पर ध्यान देना चाहिए क्योकि मामूली सुधार जैसे की गरीब देशों को तकनिकी मिल जाने से ईन समस्याओं का हल नहीं होगा|
शुमाकर के अनुसार मानवीय जरूरतों और सीमायों को ध्यान में रखकर तकनिकी का उपयोग हो| ये सिध्दांत ग्राम आधारित व्यवस्था से निकला जिसे बुद्धिस्ट अर्थव्यवस्था भी कहते हैं| वे परम्परागत व्यवस्था को दोषपूर्ण बताते हैं क्योकि ये मानता है की वृध्दि अच्छी है और बड़ा ही बेहतर हैं| बड़े देशों के द्वारा अधिक उत्पादन के बजाय अधिक लोगों द्वारा उत्पादन को महत्व मिलना चाहिए| शुमाकर ऐसे पहले अर्थशास्त्री थे जिन्होंने न्यूनतम उपभोग के साथ मानव कल्याण को अधिक उत्पादन के ऊपर तरजीह दी| उन्होंने भौतिकवाद को न्याय ,सुन्दरता और स्वास्थ्य के बाद स्थान दिया|
बहुराष्ट्रीय कम्पनीयां १९७० के बाद प्रभावी हुईं लेकिन ये द्रुत गति से बड़ी और राष्ट्रीय सरकार के प्रति उत्तदायी नहीं थी| उन्होंने चेतावनी दी की नगरों की जनसँख्या ५ लाख से अधिक न हो| मगर हम ऐसे संसार में है जहाँ जनसख्या १ करोड़ से अधिक है|
शुमाकर ने चेतावनी देदी थी की मानसिक समस्यायों जैसे अवसाद ,तनाव अच्छी तरह कैसे निपटा जाये| WHO ने कहा है की पश्चिमी देशो में तनाव और अवसाद २०२० की सबसे बड़ी समस्या होगी|
इसको हमारे हर महापुरुष ने कड़ी निंदा की वह स्वामी विवेकानंद और या श्री औरोबिंदु, लोकमान्य तिलक से लेकर महात्मा गांधीजी ने।
किन्तु खेद की बात यह हे की हमारी जनता को इन महापुरुषों की बात सुनने का समय ही नहीं हे। क्योंकि इनके लिए महापुरुष बन चुके हे सचिन तेंदुलकर या अमिताभ बच्चन। अब इन महापुरुष का कार्य ही ऐसा ही जो मनोरंजन से लेनादेना रखता हे नाकि देश की समस्या और उसके हल।
भारत की समस्या का अर्थ हे की हमारे लोगो की समस्या जिसका समाधान हमारे खुद के तरीके से ही निकाला जा सकता हे न की अमरिका का मॉडल अपनाओ या जापान का या रशिया का या ब्रिटिन का। यह सब तो हम पिछले कई दसको से कर के देख चुके हल तो मिले नही समस्या और बढ़ी। वह तो बढ़ने ही वाली थी क्योंकि वह अंधी दौड़ थी। जिस देश को या उधर के किसी बुद्धिजीवी का हमारे देश से कोई लगाव न हो और उसका सुजाया रास्ता हम अपनाये तो जाना कही हे और रास्ता कोई और पकड़ा वेसी बात हो गई जिससे मंजिल तो कभी मिलेगें ही नहीं।
हमारे देश के महापुरुष थे जिन्का इस देश के लिए गहन चिंतन था लगाव था उनकी ज़रा सोच ली होती और यह बात महात्मा गांधी से लेके हम कई हज़ार साल पिछे चले तो हमारे ऋषियो ने इतनी बड़ी व्यवस्था का निर्माण किया था की सम्पूर्ण ससटेनबल डेवल्पमेंट बात की थी और हज़ारो साल यह परम्परा चली।
पर यह समजाये कोण, सिखाये कोण हमको तो यही सिखाया गया की हमारे ऋषियो ने कुछ धार्मिक किताबे ही लिखी थी। संस्कृत की इतनी अवगणना की गयी की आज मुझे मेरा हज़ारो साल का इतिहास पढ़ना हो तो मुझे अंग्रेजी का अनुवाद पढ़ना पड़ता हे।
प्राचीन भारतीय विज्ञानं पे आधुनिक संसोधन और विचार:
हमारे ऋषियो ने नाकि धार्मिक ग्रंथो की रचना की पर सूक्ष्म विज्ञानं का अवलोकन किया और दुनिया की सबसे बेहतरीन सिस्टम बनायीं और यह में नहीं कह रहा विश्व के विकसित देश में हुई रिसर्च ही कह रहे हे।
जेसे एक उदाहरण देता हु, प्लास्टिक सर्जरी जो अड्वान्स मेडिकल साइंस गिना जाता हे उसका सबसे पहले एप्लीकेशन मेरे देश में होता था और वह महान ऋषि जिसने यह सिस्टम बनाया वह मह्रिषी शुश्रुत के बारे में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, अमेरिका का हेल्थ इंस्टिट्यूट भी बोल रहे और न जाने कितने और भी हे।
इस संस्कृत में तो यह लिखा हुआ हे की "यतोभ्युद्यनिश्रेयसिद्धि: स धर्म" अर्थात जो उन्नति करता हुआ परम् उन्नति तक ले जाये वह धर्म हे।
इससे यह ज्ञात होता हे की धर्म का मतलब आज जो बिद्धिवादि सोच रहे हे उतना संकुचित नहीं था।
मनुस्मृति में तो महायंत्रो का निर्माण ही वर्जित कर दिया गया। इससे यह भी पता चलता हे की महायंत्र तो होते होंगे पर वह सही विकास में बाधक रूप होते होंगे इसी लिए हमने उसका उपयोग सही न समजा और यही बात हमारे देश में महात्मा गांधीजी ने फिर से दोहराई थी।
गांधीजी ने कहा था की बड़े यंत्र पूंजी वादी को अधिक समृद्ध बनायेंगे थोडा रोजगार उत्पन्न करेंगे पर लाखों लोगो को बेरोजगार या दिशाहीन बना देंगे। वही हम देख रहे हे। छोटे उद्योग जितना रोजगार उत्पन्न कर रहे हे वह बड़े उधोग इतना पूंजी लगाके भी नहीं कर पा रहे हे ऊपर सम्पति केंद्रीकरण हो रहा हे। अर्थव्यवस्था पूरी केंद्रित कुछ लोगो के हाथ में हो रही हे और सरकार लाचार हे।
दुर्भाग्य की बात हे की जिस देश का स्वदेसी विज्ञान इतना विकसित हो उसी देश को लोग भूल कर, उसकी उपेक्षा कर दूसरे देश की सामान्य तकनीक को समस्त संसार की लिए भय प्रकट कर रही हो उसको अपनाने के लिए पागल बन रहे हे।
प्राचीन भारत की उत्कृष्ट तकनीक का एक उदाहरण देता हु। संस्कृत के विद्वान श्री सुब्रहन्य अय्यर को पुराने हस्त लिखित ग्रन्थ की खोज करते दक्षिण भारत में कर्नाटक एक ग्रँथ मिला
ग्रन्थ को पढ़ने और उसमे वर्णित विषय को समझने में कठोर परिश्रम लगा। शाश्त्रीय (scientific) विषय होने का कारण विशेष कठनाइ हुई। उस ग्रन्थ में कई प्रकार की मिश्रित धातुओं का वर्णन दिया गया था। वह मह्रिषी भारद्वाज के विमानशास्त्र में वर्णित विभिन्न प्रकार कद लोहे के अनुसार पाये गए। इसमें आगे संशोधन के लिए श्री अय्यर ने भारत सरकार के नेशनल इनफार्मेशन विभाग के तकनीकी अधिकारी श्री सी एस आर प्रभु को सम्पर्क किया। सयोंग से श्री प्रभु भी भोजपत्रों पे लिखे संस्कृत गर्न्थो का अध्ययन कर रहे हे थे। उनको अपने एक ग्रन्थ में धातुओं बनाने का विधियो का एक ग्रन्थ मिला। इनको परीक्षण में विमान निर्माण के लिए उपयोगी पाया गया। इसके बाद प्राचीन विधियों के अनुसार कई प्रकार की मिश्रित धातुओं के नमूने बनाये गए। इनके विषय में श्री प्रभु ने शोध पत्र भी प्रकाशित कर चुके हे।
अब भारत ही नहीं इन पर कैलिफोर्निया के एक विश्वविद्यालय में भी परीक्षण कार्य हुआ।
भारतीय भौतिक ज्ञान हज़ारो साल पुराना हे। जिसमे आज के भौतिक शास्त्र के हिसाब से उसमे कोई विभाजन नहीं था। जेसे ताप, प्रकाश, विद्युत, ध्वनि आदि।
पर हर पदार्थ में चेतना हे उस स्वरुप से देख गया और प्रयोग विश्व समाज और पर्यावरण को ध्यान में रख के ही किया गया। जहा जिस के दुष्परिणाम नज़र आये उधर वर्जित कर दिया गया।
पेड़ो को न काटना, उत्तर में सर न रखना, वगेरा। ईशावास्योपनिषद का श्लोक बहुत सहायक हे।
ईशा वास्यामिदम सर्व यत्किज्चि जगत्यां जगत।
तेन त्यतकें भुज्जीथा माँ गृधः कस्य स्विद् धनम्।
अर्थात अखिल विश्व ब्रह्मांड में जो कुछ भी चराचार जगत हे उन सबमे में चेतना का वास हे। या फिर मुले ब्रह्म, त्वचाविष्णु; शाखायाज्च महेश्वर:।
पते पते देवानाम, वृक्ष राज नमोस्तुते।।
आज के आधुनिक समाज से कही ज्यादा हमारे पूर्वजो ने पेड़ पौधों को सम्मान और रक्षण दिया होगा, यह इस श्लोक से प्रतिपादित होता हे।
आधुनिक युग के अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक मानने लगे हे।
नोबल पुरुष्कार विजेता डॉ ज्योर्ज वाल्ट का कहना हे की भौतिक जगत में चेतन शक्ति का अस्तित्व का स्वीकार करके अनेक वैज्ञानिक गुत्थियों को शुलझाया जा सकता हे।
भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर यूजेन बिगनर चेतना का सहारा लिए बिना क्वांटम मैकेनिक्स को नहीं समजा जा सकता।
मह्रिषी भारद्वाज के विमान शाश्त्र में वर्णित तमोगर्भ लोह, पंच लोह, चपल ग्राहक लोह, वधिरलोह, विद्युत दर्पण आदि हे। सबकी अपनी विशिष्टता हे।
अल बरुनी भारत की यात्रा दौरान यह कहते हे की ब्रह्मगुप्त ने कई सदियों पूर्व लिखा :पृथ्वी का गुण है आकर्षित करना और वस्तुओं को धरातल पर बनाये रखना।जल की प्रकृति है बहना ,आग का गुण जलाना है और वायु का मुख्य प्रकृति है गति।किसी भी प्रकार का बीज इसे किसी भी दिशा मे फेंका जाये हमेशा फल देता है ।
आधुनिक चिकित्सा प्रणाली:
ऐसे ही आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के कुछ आंकड़े रखता हु। विश्व आरोग्य संस्था (WHO - World Health Organization) के रिपोर्ट अनुसार 10% सबसे गरीब देश में बीमारी जो मृत्यु का कारण हे। जबकि 30% मध्यम अमीर देश और 20% सबसे अमीर देश के लोगो की मौत का कारण बीमारिया हे।
अब सबसे बडि आश्चर्य की बात यह हे की दुनिया के सबसे अमीर देश में बीमारियों से मौत का कारण को गरीब देश से दुगना हे। जबकि वहा सबसे विशालकाय फार्मा कंपनी, बड़े अस्पताल, हाई टेक मेडिकल सिस्टम हे।
जबकि गरीब देश के पास उनका पारम्परिक ज्ञान ही हे जिस से वह दवा करते हे।
आंकड़ो के अनुसार देखे तो यह पता चले की आधुनिक चिकित्सा प्रणाली से बेहतर तो पारम्परिक ज्ञान लोगो को मौत से ज्यादा बचाता हे। तो पुरे दुनिया में एलोपैथी का डंका क्यों बज रहा हे और क्यों सरकार भी उसको प्राथमिकता दे रही हे। यह प्रणाली पुरे दुनिया में जरूर नहीं तो फिर बड़ी कंपनी के साजिश ही हे यह अनुमान सामान्य बुद्धिजीवी भी कर सकता हे।
अब लोगो में तो यही भ्रमना हे की विकसित देश यानी अमेरिका और यूरोप तो स्वर्ग समान हे। उधर कोई समस्या ही नहीं उधर से ली गई सारी व्यवस्था दुनिया की समस्या दूर कर देगी। पर सत्य यह नहीं हे। लोगो में जानकारी का अभाव हे। उसी लिए यहाँ कुछ सही जानकारी रख रहा हु।
अधिक विकसित देशों में जन स्वास्थ्य की दर अंत्यंत न्यूनतम है| स्वास्थ्य सर्वे के आधार पर ये पाया गया की
बड़े शहरों में सभी व्यक्ति पीड़ित हैं किसीको रक्तचाप की समस्या है तो किसी को दिल की परेशानियाँ या मधुमेह से ग्रस्त है कोई | शायद ही ऐसा कोई मिलेगा जिसने डॉक्टर से सलाह न लेता या जिसने कोई शल्य चिकित्सा नहीं करवाई| अपराध की दर बहुत बढ गयी है यहाँ | नित्य अपराध के नए तरीके खोजे जाते हैं | स्कूल के बच्चे तनावग्रस्त होकर अपने सहपाठियों पर गोलियां चलाकर शिकार बना रहे |
प्रोफ़ेसर आइसेंबर्ग एक अमेरिकी चिकित्सा विशेषज्ञ कहते हैं की अमेरिका में पूर्ण स्वस्थ कोई नहीं है| अमेरिकन स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार सभी में कोई न कोई विकृति है|
स्वास्थ्य रक्षा और आधुनिक चिकित्सा
आम लोगों में एक भ्रम है की लोगों के स्वास्थ्य के डॉक्टर और चिकित्सालय अत्यंत जरुरी है.| जबकि तथ्य ये भी है कि अस्पताल और डॉक्टर का समाज के स्वास्थ्य को ख़राब करने में बड़ा योगदान है | हमारा शारीर बहुत ही गतिशील है | ये प्रकृति के नियमों से संचालित होता हैं और ये प्रकृति स्वयं में बहुत ही गतिशील है |
मानव शरीर एक स्वमेव इम्यूनो विकार प्रणाली है जो की पूर्णतया प्राकृतिक हैं | चिकित्सीय हस्तक्षेप इसे विकृत कर देता हैं और स्वास्थ्य को बिगाड़ देता है | यदि यह हस्तक्षेप जारी रहता है तो भविष्य में समुचित विकास सिद्धांत की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है अर्थात भविष्य में मानव शारीर में विकृतिया आ सकती हैं|
जब इस्रायल में डॉक्टरों ने हड़ताल की तब लोगों के अस्वस्थ्य होने और मृत्युदर दोनों में बहुत ही गिरावट दर्ज की गई|
हमको और एक चीज़ बतायी गई पढाई गई की मांसाहार जरुरी हे। उससे पोषण मिलता हे। स्वस्थ रहते हे। अब यह कितना बड़ा जूठ हे यह में नहीं पर एक विशेसज्ञ की बात से पता चलता हे।
डॉ जे Oldfield, वरिष्ठ फिजिशियन, लेडी मार्गरेट अस्पताल, लिखते हैं: ये अकाट्य सत्य है की शाकाहार में वो हर तत्व मौजूद है जो मानव की सभी जरूरतों को पूरा कर सकता हैं | मांस अप्राकृतिक भोजन है जो शरीर में विभिन्न विकार उत्पन्न करता है| इससे मानव अनेक रोगों जैसे कैंसर ,ज्वर और पेट के कीड़े से संक्रमित हो जाता है| मांस भक्षण पैदा होने वाले १०० मेसे ९९ लोगों में रोगों का गंभीर कारन है |
मांस खाना और शराब का सेवन दोनों एक जेसे ही हैं| शराब की लत स्वाभाविक मृत्यु की तरह है जब मांस हटा दिया जाये| जन्म नियंत्रण उन लोगों में कठिन है जो मांस खाते हैं| मानसिक नियंत्रण मास्भ्क्शियों में एकदम असंभव है | देखो की बाघ जो मॉस खता है कितना क्रूर है और हठी और गाय जो शाकाहारी है कितने शांतिप्रिय हैं| मांसभक्षण बुध्दी पर सीधा बुरा असर डालता है| मांस खाने वाले देशों में कैंसर से मरने वालों की संख्या अधिक हैं| पश्चिमी देशों में डॉक्टर मरीज को शाकाहार पर रखते हैं और वो जल्दी ही ठीक हो जाते हैं|
आधुनिक अर्थशास्त्र:
कई दसको से लोगो को यही बताया गया की पश्चिम के देश विकसित हे और बाकि अल्प विकसित और उनका विकास दूर करने के लिए विश्व में बड़ी संस्थाये बनायीं गई जेसे WTO, IMF और उसके बाद ऐसी अंधी दौड चली के हर सरकार, बुद्धिजीवी वर्ग यही मानने लगा की उनकी बिना विकास नहीं हो सकता। आज कुछ दसको की बाद उनकी नीतियों पे चलके क्या प्राप्त किया वह देखते हे।
CATO द्वारा उपलब्ध करवाई गई पुस्तक जो विश्व की बड़ी संस्थान का पर्दाफाश करती हे।
गरीबी बनाये रखने में
विश्व बैंक और IMF का योगदान
तीसरी दुनिया अर्थात विकासशील देश गरीब माने गए क्योकि कहा गया की उनके पास पूंजी नही है इसलिए वे गरीब है।
इस पूंजी की कमी को दूर करने के लिए ये हल दिया गया की इन देशों मे विकसित देशों से धन भेजा जाये। चूंकि निजी क्षेत्र यहाँ समृद्धि लाने मे अनिच्छुक और असमर्थ माना गया इस कारण से सरकारों को अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए आगे आना पड़ा।
विदेशी धन अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएगा। दुर्भाग्यपूर्ण 40 बर्षों मे भी इस विदेशी ऋण की मदद ने इन देशों की कोई मदद नही की अर्थात कोई सुधार न हुआ और इसके विपरीत गरीबी बढ़ गयी।
इसका एक कारण ये भी था की इन राष्ट्रों की समस्या धन के अलावा और भी थी । धन स्थान्तरण का सिद्धान्त कुछ विकसित देशों की संस्थाओं द्वारा तैयार त्रुटिपूर्ण विकास मॉडल की देंन था।
विश्वबैंक और IMF जैसी संस्थाओं ने गरीब देशों को धन सहायता के रूप मे ऋण देना जारी रखा और ये राष्ट्र गरीब होते गए और अर्थतंत्र बीगड़ गया।
स्मॉल इज बुटिफूल अर्थशाश्त्र का एक अध्ययन निवंधों का संग्रह है जो बिटिश अर्थशाष्त्री ई ऍफ़ शुमाकर ने लिखा|
स्मॉल इज बुटिफूल में शुमाकर द्वारा पश्चिमी अर्थशास्त्र पर लिखी एक आलोचना है जो १९७३ में ऊर्जा संकट और वैश्वीकरण का उदय के दौरान |
शुमाकर तर्क देते है की आधुनिक अर्थव्यवस्था अस्थिर है | प्राकृतिक संसाधन (जीवाश्म) को आय बढाने वाला समझा जाता है जबकि उन्हें पूंजी माना जाना चाहिए क्योकि वे नवीकरणीय नहीं है और कभी भी समाप्त हो सकते हैं| प्रकृति की प्रदुषण को नियंत्रित करने की क्षमता बहुत सीमित है|सरकार को रचनात्मक विकास पर ध्यान देना चाहिए क्योकि मामूली सुधार जैसे की गरीब देशों को तकनिकी मिल जाने से ईन समस्याओं का हल नहीं होगा|
शुमाकर के अनुसार मानवीय जरूरतों और सीमायों को ध्यान में रखकर तकनिकी का उपयोग हो| ये सिध्दांत ग्राम आधारित व्यवस्था से निकला जिसे बुद्धिस्ट अर्थव्यवस्था भी कहते हैं| वे परम्परागत व्यवस्था को दोषपूर्ण बताते हैं क्योकि ये मानता है की वृध्दि अच्छी है और बड़ा ही बेहतर हैं| बड़े देशों के द्वारा अधिक उत्पादन के बजाय अधिक लोगों द्वारा उत्पादन को महत्व मिलना चाहिए| शुमाकर ऐसे पहले अर्थशास्त्री थे जिन्होंने न्यूनतम उपभोग के साथ मानव कल्याण को अधिक उत्पादन के ऊपर तरजीह दी| उन्होंने भौतिकवाद को न्याय ,सुन्दरता और स्वास्थ्य के बाद स्थान दिया|
बहुराष्ट्रीय कम्पनीयां १९७० के बाद प्रभावी हुईं लेकिन ये द्रुत गति से बड़ी और राष्ट्रीय सरकार के प्रति उत्तदायी नहीं थी| उन्होंने चेतावनी दी की नगरों की जनसँख्या ५ लाख से अधिक न हो| मगर हम ऐसे संसार में है जहाँ जनसख्या १ करोड़ से अधिक है|
शुमाकर ने चेतावनी देदी थी की मानसिक समस्यायों जैसे अवसाद ,तनाव अच्छी तरह कैसे निपटा जाये| WHO ने कहा है की पश्चिमी देशो में तनाव और अवसाद २०२० की सबसे बड़ी समस्या होगी|

