Friday, 29 July 2016

विभिन्न विषयों के संस्कृत ग्रन्थ



विभिन्न विषयों के संस्कृत ग्रन्थ

गणित तथा ज्योतिष

 वेदांग ज्योतिष – लगध

 बौधायन शुल्बसूत्र – बौधायन

 मानव शुल्बसूत्र – मानव

 आपस्तम्ब शुल्बसूत्र – आपस्तम्ब

 सूर्यप्रज्ञप्ति –

 चन्द्रप्रज्ञप्ति –

 स्थानांग सूत्र –

  भगवती सूत्र –

 अनुयोगद्वार सूत्र

 बख्शाली पाण्डुलिपि

 छन्दशास्त्र – पिंगल

 लोकविभाग – सर्वनन्दी

 आर्यभटीय -- आर्यभट प्रथम

 आर्यभट्ट सिद्धांत -- आर्यभट प्रथम

 दशगीतिका -- आर्यभट प्रथम

 पंचसिद्धान्तिका – वाराहमिहिर

 महाभास्करीय -- भास्कर प्रथम

 आर्यभटीय भाष्य -- भास्कर प्रथम

 लघुभास्करीय -- भास्कर प्रथम

 लघुभास्करीयविवरण – शंकरनारायण

 यवनजातक – स्फुजिध्वज

 ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त – ब्रह्मगुप्त

 करणपद्धति -- पुदुमन सोम्याजिन्

 करणतिलक -- विजय नन्दी

 गणिततिलक – श्रीपति

 सिद्धान्तशेखर – श्रीपति

 ध्रुवमानस – श्रीपति

 महासिद्धान्त -- आर्यभट द्वितीय

 अज्ञात रचना -- जयदेव (गणितज्ञ), उदयदिवाकर की सुन्दरी नामक टीका में इनकी विधि का

उल्लेख है।

 पौलिसा सिद्धान्त --

 पितामह सिद्धान्त --

 रोमक सिद्धान्त --

 सिद्धान्त शिरोमणि -- भास्कर द्वितीय

 ग्रहगणित -- भास्कर द्वितीय

 करणकौतूहल -- भास्कर द्वितीय

 बीजपल्लवम् -- कृष्ण दैवज्ञ -- भास्कराचार्य के बीजगणित की टीका

 बुद्धिविलासिनी -- गणेश दैवज्ञ -- भास्कराचार्य के लीलावती की टीका

 गणितसारसंग्रह -- महावीराचार्य

 सारसंग्रह गणितमु (तेलुगु) -- पावुलूरी मल्लन (गणितसारसंग्रह का अनुवाद)

 वासनाभाष्य -- पृथूदक स्वामी -- ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त का भाष्य (८६४ ई)

 पाटीगणित -- श्रीधराचार्य

 पाटीगणितसार या त्रिशतिका -- श्रीधराचार्य

 गणितपञ्चविंशिका -- श्रीधराचार्य

 गणितसार -- श्रीधराचार्य

 नवशतिका -- श्रीधराचार्य

 क्षेत्रसमास -- जयशेखर सूरि (भूगोल/ज्यामिति विषयक जैन ग्रन्थ)

 सद्रत्नमाला -- शंकर वर्मन ; पहले रचित अनेकानेक गणित-ग्रन्थों का सार

 सूर्य सिद्धान्त -- रचनाकार अज्ञात ; वाराहमिहिर ने इस ग्रन्थ का उल्लेख किया है।

 तन्त्रसंग्रह -- नीलकण्ठ सोमयाजिन्

 वशिष्ठ सिद्धान्त --

 वेण्वारोह -- संगमग्राम के माधव

 युक्तिभाषा या; गणितन्यायसंग्रह (मलयालम भाषा में) -- ज्येष्ठदेव

 गणितयुक्तिभाषा (संस्कृत में) -- रचनाकार अज्ञात

 युक्तिदीपिका -- शंकर वारियर

 लघुविवृति -- शंकर वारियर

 क्रियाक्रमकरी (लीलावती की टीका) -- शंकर वारियर और नारायण पण्डित

 भटदीपिका -- परमेश्वर (गणितज्ञ) -- आर्यभटीय की टीका

 कर्मदीपिका -- परमेश्वर -- महाभास्करीय की टीका

 परमेश्वरी -- परमेश्वर -- लघुभास्करीय की टिका

 विवरण -- परमेश्वर -- सूर्यसिद्धान्त और लीलावती की टीका

 दिग्गणित -- परमेश्वर -- दृक-पद्धति का वर्णन (१४३१ में रचित)

 गोलदीपिका -- परमेश्वर -- गोलीय ज्यामिति एवं खगोल (१४४३ में रचित)

 वाक्यकरण -- परमेश्वर -- अनेकों खगोलीय सारणियों के परिकलन की विधियाँ दी गयी हैं।

 गणितकौमुदी -- नारायण पंडित

 तगिकानि कान्ति -- नीलकान्त

 यंत्रचिंतामणि -- कृपाराम

 मुहर्ततत्व -- कृपाराम

 भारतीय ज्योतिष (मराठी में) -- शंकर बालकृष्ण दीक्षित

 दीर्घवृत्तलक्षण -- सुधाकर द्विवेदी

 गोलीय रेखागणित -- सुधाकर द्विवेदी

 समीकरण मीमांसा -- सुधाकर द्विवेदी

 चलन कलन -- सुधाकर द्विवेदी

 वैदिक गणित -- स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ

 सिद्धान्ततत्वविवेक -- कमलाकर

 रेखागणित -- जगन्नाथ सम्राट

 सिद्धान्तसारकौस्तुभ -- जगन्नाथ सम्राट

 सिद्धान्तसम्राट -- जगन्नाथ सम्राट

 करणकौस्तुभ -- कृष्ण दैवज्ञ

व्याकरण तथा भाषाविज्ञान

 संग्रह -- व्याडि (लगभग ई. पू. 400 ; व्याकरण के दार्शनिक विवेचन का आदि-ग्रन्थ)

 अष्टाध्यायी -- पाणिनि

 महाभाष्य -- पतञ्जलि

 वाक्यपदीय -- भर्तृहरि (लगभग ई. 500, व्याकरणदर्शन का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ)

 त्रिपादी (या, महाभाष्यदीपिका) -- भर्तृहरि (महाभाष्य की टीका)

 काशिकावृत्ति -- जयादित्य तथा वामन (छठी शती)

 वार्तिक -- कात्यायन

 प्रदीप -- कैयट

 सूक्तिरत्नाकर -- शेषनारायण

 भट्टिकाव्य (या, रावणवध) -- भट्टि (सातवीं शती)

 चांद्रव्याकरण -- चंद्रगोमिन्‌

 कच्चान व्याकरण -- कच्चान (पालि का प्राचीनतम उपलब्ध व्याकरण)

 मुखमत्तदीपनी -- विमलबुद्धि (कच्चान व्याकरण की टीका तथा न्यास, 11वीं सदी)

 काशिकाविवरणपंजिका (या, न्यास) -- जिनेंद्रबुद्धि (लगभग 650 ई., काशिकावृत्ति की टीका)

 शब्दानुशासन -- हेमचन्द्राचार्य

 पदमंजरी -- हरदत्त (ई. 1200, काशिकावृत्ति की टीका)

 सारस्वतप्रक्रिया -- स्वरूपाचार्य अनुभूति

 भागवृत्ति (अनुपलब्ध, काशिका की पद्धति पर लिखित)

 भाषावृत्ति -- पुरुषोत्तमदेव (ग्यारहवीं शताब्दी)

 सिद्धान्तकौमुदी -- भट्टोजि दीक्षित (प्रक्रियाकौमुदी पर आधारित)

 प्रौढमनोरमा -- भट्टोजि दीक्षित (स्वरचित सिद्धान्तकौमुदी की टीका)

 वैयाकरणभूषणकारिका -- भट्टोजि दीक्षित

 शब्दकौस्तुभ -- भट्टोजि दीक्षित (ई. 1600, पाणिनीय सूत्रों की अष्टाध्यायी क्रम से एक अपूर्ण

व्याख्या)

 बालमनोरोरमा -- वासुदेव दीक्षित (सिद्धान्तकौमुदी की टीका)

 रूपावतार -- धर्मकीर्ति (ग्यारहवीं शताब्दी)

 मुग्धबोध -- वोपदेव

 प्रक्रियाकौमुदी -- रामचंद्र (ई. 1400)

 मध्यसिद्धान्तकौमुदी -- वरदराज

 लघुसिद्धान्तकौमुदी -- वरदराज

 सारसिद्धान्तकौमुदी -- वरदराज

 प्रक्रियासर्वस्व -- नारायण भट्ट (सोलहवीं शताब्दी)

 प्रसाद -- विट्ठल

 प्रक्रियाप्रकाश -- शेषकृष्ण

 तत्वबोधिनी -- ज्ञानेन्द्र सरस्वती (सिद्धांतकौमुदी की टीका)

 शब्दरत्न -- हरि दीक्षित (प्रौढमनोरमा की टीका)

 मनोरमाकुचमर्दन -- जगन्नाथ पण्डितराज (भट्टोजि दीक्षित के प्रौढ़मनोरमा नामक व्याकरण

के टीकाग्रंथ का खंडन)

 स्वोपज्ञवृत्ति -- (वाक्यपदीय की टीका)

 वैयाकरणभूषणसार -- कौण्डभट्ट (ई. 1600)

 वैयाकरणसिद्धान्तमंजूषा -- नागेश भट्ट (व्याकरणदर्शनग्रंथ)

 परिभाषेन्दुशेखर -- नागेश भट्ट (इस यशस्वी ग्रंथ पर अनेक टीकाएँ उपलब्ध हैं।)

 लघुशब्देन्दुशेखर -- नागेश भट्ट (सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्या)

 बृहच्छब्देन्दुशेखर -- नागेश भट्ट (सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्या)

 शब्देन्दुशेखर -- नागेश भट्ट

 वैयाकरणसिद्धान्तलघुमंजूषा -- नागेश भट्ट

 वैयाकरणसिद्धान्तपरमलघुमंजूषा -- नागेश भट्ट

 महाभाष्य-प्रत्याख्यान-संग्रह -- नागेश भट्ट

 उद्योत -- नागेश भट्ट (पतंजलिकृत महाभाष्य पर टीकाग्रंथ)

 स्फोटवाद -- नागेश भट्ट

 स्फोटचंद्रिका -- कृष्णभट्टमौनि

 स्फोटसिद्धि -- भरतमिश्र

 परिभाषावृत्ति -- सीरदेव

 परिभाषावृत्ति -- पुरुषोत्तमदेव

 परिभाषाप्रकाश -- विष्णुशेष

 गदा -- परिभाषेंदुशेखर की टीका

 भैरवी -- परिभाषेंदुशेखर की टीका

 भावार्थदीपिका -- परिभाषेंदुशेखर की टीका

 हरिनामामृतव्याकरण -- जीव गोस्वामी

 परिमल -- अमरचन्द

शब्दकोश

 निघण्टु -- यास्क -- वैदिक शब्दकोश

 निरुक्त -- यास्क -- निघण्टु पर शब्दार्थ कोश

 अमरकोश (नामलिंगानुशासन या त्रिकांड -- अमरसिंह

 विश्वप्रकाश

 मेदिनी

 नानार्थार्णवसंक्षेप

 वर्णदेशना

 षडर्थनिर्णयकोश

 षड्मुखकोश

 लघुशब्देंदुशेखर

 बृहतच्छब्देंदुशेखर

 बालमनोरमा

 प्रौढ़मनोरमा

 बृहत अमरकोश -- राजमुकुट कृत अमरकोश टीका

 बृहानंद अमरकोश -- सर्वदानन्द

 बृहत् हारावली -- भानुदीक्षित

 हारवली

 शब्दार्णवसंक्षेप

 कल्पद्रुकोश

 निघण्टु -- यास्क

 निरुक्त -- यास्क

 धातुपाठ -- पाणिनी

 गणपाठ -- पाणिनी

 अमरकोश -- अमरसिंह

 धन्वन्तरिनिघण्टु -- धन्वन्तरि

 अनेकार्थसमुच्चय -- शाश्वत -- इसी को शाश्वतकोश भी कहते हैं

 अभिधानरत्नमाला -- भट्ठ हलायुध (समय लगभग १० वीं० शताब्धी ई०)

 वैजयंती कोश -- यादवप्रकाश (समय १०५५ से १३३७ के मध्य)

 पाइयलच्छी नाममाला --

 देशीनाममाला -- हेमचंद्र -- (प्राकृत—अपभ्रंश—कोश)

 अभिधानचिंतामणि या अभिधानचिंतामणिनाममाला -- हेमचंद्र -- प्रसिद्ध पर्यायवाची कोश

 लिंगानुशासन -- हेमचंद्र

 यशोविजय -- हेमचंद्र -अभिधानचिंतामणि पर उनकी स्वविरचित टीका

 व्युत्पत्तिरत्नाकर (देवसागकरणि) --हेमचंद्र -- टीकाग्रन्थ

 सारोद्धार (वल्लभगणि) -- प्रसिद्ध टीका

 अनेकार्थसंग्रह -- हेमचंद्र

 विश्वप्रकाश - महेश्वर (११११ ई०) -- इसे विश्वकोश भी अधिकतः कहा जाता है।

 शब्दभेदप्रकाश -- महेश्वर -- वस्तुतः विश्वप्रकाश का परिशिष्ट है।

 अनेकार्थ -- मंख पंडित (१२ वीं शती ई०)

 नानार्थसंग्रह -- अजयपाल (लगभग १२ वीं—१३ वी शती के बीच)

 नाममाला -- धनंजय (ई० १२ वी० शताब्दी उत्तरार्ध के आसपास अनुमानित)

 हारावली -- पुरुषोत्तमदेव (समय ११५९ ई० के पूर्व)

 त्रिकांडकोश -- पुरुषोत्तमदेव -- यह अमरसिंह के त्रिकाण्डकोश से अलग है।

 वर्णदेशन -- पुरुषोत्तमदेव

 एकाक्षरकोश -- पुरुषोत्तमदेव

 द्विरूपकोश -- पुरुषोत्तमदेव

 वर्णदेशना -- पुरुषोत्तमदेव

 त्रिकांडकोष -- पुरुषोत्तमदेव

 हारावली -- पुरुषोत्तमदेव

 द्विरूपकोश -- श्रीहर्ष (उपरोक्त ग्रन्थ से अलग ग्रन्थ)

 नानार्थार्णव -- केशवस्वामी (समय १२ वीं या १३ वीं शताब्दी)

 नानार्थशब्दकोश -- मेदिनि -- (लगभग १४ वी शताब्दी के आसापास) ; यह मेदिनिकोष नाम से

अधिक विख्यात है।

 अपवर्गनाममाला -- जिनभद्र सुरि -- इसको पंचवर्गपरिहारनाममाला भी कहते है।

 शब्दरत्नप्रदीप -- कल्याणमल्ल (समय लगभग १२९५ ई०)

 शब्दरत्नाकर -- महीप (लगभग १३७४ ई०)

 भूरिकप्रयोग -- पद्यगदत्त

 शब्दमाला -- रामेश्वर शर्मा

 नानार्थरत्नमाला -- भास्कर अथवा दंडाधिनाथ (१४ वी शताब्दी के विजयनगर के राजा हरिहरगिरि

की राजसभा में थे)

 अभिधानतंत्र -- जटाधर

 अनेकार्थ या नानार्थकमंजरी -- नामांगदसिंह का लघु नानार्थकारी है।

 रूपमंजरीनाममाला -- रूपचंद्र (१६वीं शती)

 शारदीय नाममाला -- हर्षकीर्ति

 शब्दरत्नाकर -- वर्मानभट्ट वाण

 नामसंग्रहमाला -- अप्पय दीक्षित

 नामकोश -- सहजकीर्ति (१६२७)

 पंचचत्व प्रकाश -- सहजकीर्ति (१६४४)

 कल्पद्रुमकोश -- केशव -- केशवस्वामी से ये भिन्न हैं।

 नानार्थर्णव -- केशवस्वामी

 शब्दरत्नावली -- मथुरेश (समय १७वी शताब्दी)

 कोशकल्पतरु -- विश्वनाथ

 नानार्थपदपीठिका -- सुजन

 शब्दलिंगार्थचंद्रिका -- सुजन

 पर्यायपदमंजरी --

 शब्दार्थमंजूषा --

 पर्यायरत्नमाला -- महेश्वर (संभवतः पर्यायवाची कोश विश्वप्रकाश के निर्माता महेश्वर से भिन्न

हैं।

 पर्यांयशब्दरत्नाकर -- धनंजय भट्टाचार्य

 विश्विमेदिनी -- सारस्वत भिन्न

 विश्वनिघंटु -- विश्वकवि

 लोकप्रकाश -- क्षेमेंद्र

 अनेकार्थमाला -- महीप

 पर्यामुक्तावली -- हरिचरणसेन

 पंचनत्वप्रकाश -- वेणीप्रसाद

 राघव खांड़ेकर -- केशावतंस

 अनेकार्थध्वनिमंजरी -- महाक्षपणक

 आख्यातचीन्द्रिक -- भट्टमल्ल (क्रियाकोश)

 लिंगानुशासन -- हर्ष

 शब्दभेदप्रकाश -- अनिरुद्ध

 शिवकोश (वैद्यक) -- शिवदत्त वैद्य

 गणितार्थ नाममाला --

 नक्षत्रकोश --

 लैकिकन्यायसाहस्री -- भुवनेश (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)

 लौकिक न्यायसंग्रह -- (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)

 लौकिक न्याय मुक्तावली -- (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)

 लौकिकन्यायकोश -- (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)

 शब्दकल्पद्रुम -- राधाकान्त देव (१८८६-९४)

 वाचस्पत्यम् --

रसविद्या

 आनन्दकन्द

 भावप्रकाश -- भावमिश्र

 कैयदेवनिघण्टु

 मदनपालनिघण्टु

 रसहृदयतन्त्र -- गोविन्द भगवतपाद

 रसकामधेनु

 रसमञ्जरी -- शालिनाथ

 रसप्रकाशसुधाकर

 रसरत्नसमुच्चय -- वाग्भट

 रसरत्नाकर -- नागार्जुन

 रससंकेतकलिका

 रसाध्याय

 रसार्णव -- गोविन्दाचार्य

 रसेन्द्रचिन्तामणि -- सुधाकर रामचन्द्र

 रसेन्द्रचूड़ामणि -- सोमदेव

 राजनिघण्टु

 सार्ङ्गधरसंहिता -- सार्ङ्गधर

 अष्टांगहृदय -- वाग्भट

 अष्टांगसंग्रह -- वाग्भट

 रसेन्द्रमंगल -- नागार्जुन

 रसकौमुदी --

 रससार --

 रसप्रकाश -- यशोधर

आयुर्वेद

 वृहत्त्रयी :

·         चरकसंहिता -- - चरक

·         सुश्रुतसंहिता -- - सुश्रुत

·         अष्टांगहृदय -- - वाग्भट

 लघुत्रयी :

:         माधव निदान -- - माधवकर

·         शार्ड़्गधर संहिता -- - शार्ड़्गधर

·         भावप्रकाश -- - भाव मिश्र

 अन्य:

अष्टांगसंग्रह (४०० ई)

शार्ङ्गधरसंहिता -- शार्ङ्गधर (१३०० ई)

कश्यपसंहिता (इसमें कौमारभृत्य (बालचिकित्सा) की विशेष रूप से चर्चा है।)

वंगसेनसंहिता (या चिकित्सासारसंग्रह)-- - वंगसेन

निबन्धसंग्रह -- दल्हण (इसमें दल्हण के पूर्व के अनेक आयुर्वेदाचार्यों के मत संकत्लित हैं )

बोवर पाण्डुलिपि (Bower Manuscript)

:* आरोग्य कल्पद्रुम

·         अर्क प्रकाशन

·         आर्य भिशक

·         अष्टांग हृदय

·         अष्टांगसंग्रह

·         आयुर्वेद कल्पद्रुम

·         आयुर्वेद प्रकाश

·         आयुर्वेद संग्रह

·         भैषज्य रत्नावली

·         भारत भैषज्य रत्नाकर

·         भाव प्रकाश

·         वृहत निघण्टु रत्नाकर

·         चरक संहिता

·         चरक दत्त

·         गद निग्रह

·         कुपि पक्व रसायन

·         निघण्टु रत्नाकर

·         रस चन्दांशु

·         रस रज सुन्दर

·         रसरत्न समुच्चय

·         रसतन्त्रसार व सिद्धप्रयोगसंग्रह

·         रसतरंगिणी

·         रस योग रत्नाकर

·         रस योग संग्रह

·         रस प्रदीपिका

·         रसेन्द्र सार संग्रह

·         रस प्रदिपिका

·         सहस्रयोग

·         सर्वरोग चिकित्सा रत्न

·         सर्वयोग चिकित्सा रत्न

·         शार्ङ्गधर संहिता

·         सिद्ध भैषज्यमणिमाला

·         सिद्ध योग संग्रह

·         सुश्रुत संहिता

·         वैद्य चिंतामणि

·         वैद्यक शब्द सिन्धु

·         वैद्यक चिकित्सा सार

·         वैद्य जीवन

·         बसव रजीयं

·         योग रत्नाकर

·         योग तरंगिणी

·         योग चिंतामणि

·         कश्यप संहिता

·         भेल संहिता

·         विश्वनाथ चिकित्सा

·         वृन्द चिकित्सा

·         आयुर्वेद चिंतामणि

·         आभिनव चिंतामणि

·         आयुर्वेद रत्नाकर

·         योगरत्न संग्रह

·         रसामृत

·         द्रव्यगुण निघण्टु

·         रसमञ्जरी

·         वंगसेनसंहिता

·         आयुर्वेदिक सार संग्रह

काव्यशास्त्र

नाट्यशास्त्र -- भरतमुनि

काव्यप्रकाश -- मम्मट

टीकाएँ:

·         अलंकारसर्वस्व -- रुय्यक

·         संकेत टीका -- माणिक्यचंद्र सूरि (रचनाकाल ११६० ई.)

·         दीपिका -- चंडीदास (१३वीं शती)

·         काव्यप्रदीप -- गोविंद ठक्कुर (१४वीं शती का अंतभाग)

·         सुधासागर या सुबोधिनी -- भीमसेन दीक्षित (रचनाकाल १७२३ ई.)

·         दीपिका -- जयंतभट्ट (र.का. १२९४ ई.)

·         काव्यप्रकाशदर्पण -- विश्वनाथ कविराज (१४वीं शती)

·         विस्तारिका -- परमानंद चक्रवर्ती (१४वीं शती)

 साहित्यदर्पण -- विश्वनाथ

 काव्यादर्श -- दण्डी

 काव्यमीमांसा -- कविराज राजशेखर (८८०-९२० ई.)

 दशरूपक -- धनिक

 ध्वन्यालोक -- आनन्दवर्धन

·         लोचन -- अभिनव गुप्तपाद (ध्वन्यालोक की टीका)

 काव्यप्रकाशसंकेत -- माणिक्यचंद्र (११५९ ई)

 अलंकारसर्वस्व -- राजानक रुय्यक

 चंद्रालोक --

 अलंकारशेखर -- केशव मिश्र

संगीत

 नाट्यशास्त्र -- भरत मुनि

 बृहद्देशीय -- मतंग मुनि

 नारदीय शिक्षा --

 संगीत मकरंद --

 सरस्वती हृदयालंकार -- मिथिला के राजा नान्यदेव (11वीं शती)

 अभिलषितार्थ चिंतामणि -- सोमेश्वर (12वीं शती)

 संगीतचूड़ामणि -- सोमेश्वर के पुत्र प्रतापचक्रवर्ती या जगदेकमल्ल (12वीं शती)

 संगीतसुधाकर -- चालुक्यवंशीय सौराष्ट्रनरेश महाराज हरिपाल (1175 ई.)

 संगीतरत्नावली -- सोमराज देव या सोमभूपाल (1180)

 गीतगोविन्द -- जयदेव (12वीं शती ई.)

 पंडिताराध्यचरितम् -- पाल्कुरिकि सोमनाथ (तेलगु में, 1270 ई.)

 संगीतरत्नाकर -- शार्ङ्गदेव (तेरहवीं शती)

 शृंगारहार -- शाकंभरि के राजा हम्मीर (लगभग 1300 ई.)

 संगीत-समय-सार -- जैन आचार्य पार्श्वदेव (लगभग 1300)

 संगीतसार -- विद्यारण्य (चौदहवीं शताब्दी)

 रागतरंगिणी -- लोचन कवि (पन्द्रहवीं शताब्दी)

 संगीतशिरोमणि -- अनेक पण्डितों का योगदान (मलिक सुलतान के आह्वान पर, पन्द्रहवीं

शताब्दी)

 रसिकप्रिया -- मेवाड़ के महाराणा कुंभ (गीतगोविन्द की टीका, 1431-1469 ई.)

 संगीतराज -- महाराणा कुम्भ

 मानकुतूहल -- ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर (हिन्दी में, 15वीं शती)

 षड्रागचंद्रोदय -- पुण्डरीक विट्ठल (सोलहवीं शताब्दी)

 रागमाला -- पुण्डरीक विट्ठल

 रागमंजरी -- पुण्डरीक विट्ठल

 नर्तननिर्णय -- पुण्डरीक विट्ठल

 स्वरमेलकलानिधि -- कर्णाटक संगीत के विद्वान् रामामाला (1550 ई.)

 स्वरमेल कलानिधि -- रामामात्य (सोलहवीं शताब्दी)

 रागविबोध -- सोमनाथ (1609 ई.)

 संगीतसुधा -- तंजोर के राजा रघुनाथ (अपने मंत्री गोविंद दीक्षित की सहायता से 1620 ई. में)

 चतुर्दंडीप्रकाशिका -- व्यंकटमखी (सन् 1630 ई.)

 संगीतदर्पण -- दामोदर मिश्र (लगभग सन् 1630 ई.)

 हृदय प्रकाश -- हृदयनारायण देव (सत्रहवीं शताब्दी)

 हृदय कौतुकम् -- हृदयनारायण देव (सत्रहवीं शताब्दी)

 संग्रहचूड़ामणि -- गोविंद (1680-1700)

 संगीत पारिजात -- अहोबल (१७वीं शती)

 संगीत दर्पण -- दामोदर पण्डित

 अनूपविलास -- भावभट्ट

 अनूपसंगीतरत्नाकार --भावभट्ट

 अनुपांकुश --भावभट्ट

 संगीतसार -- जयपुर के महाराज प्रतापसिंह (1779-1804 ई.)

 अष्टोत्तरशतताललक्षणाम् -- सोमनाथ

 रागतत्वविबोध -- श्रीनिवास (18वीं शती)

 रागतत्वविबोध: -- श्रीनिवास पण्डित (अठारहवीं शताब्दी)

 संगीतसारामृतम् -- तंजोर के मराठा राजा तुलजेन्द्र भोंसले (18वीं शती)

 रागलक्षमण् -- तुलजेन्द्र भोंसले

 लक्ष्यसंगीतम्‌ -- विष्णु नारायण भातखंडे (संस्कृत ; 1910, १९३४)

 अभिनवरागमंजरी -- विष्णु नारायण भातखंडे (संस्कृत ; 1910, १९३४)

 हिंदुस्तानी संगीत पद्धति -- विष्णु नारायण भातखंडे (मराठी में)

 हिंदुस्तानी संगीत क्रमीक (छह भागों में) -- विष्णु नारायण भातखंडे

 संगीत तत्त्वदर्शक -- विष्णु दिगंबर पलुस्कर (20वीं शती)

वास्तुशास्त्र

३५० से भी अधिक ग्रन्थों में स्थापत्य की चर्चा मिलती है। इनमें से प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित हैं-

 अपराजितपृच्छा (रचयिता : भुवनदेवाचार्य ; विश्वकर्मा और उनके पुत्र अपराजित के बीच

वार्तालाप)

 ईशान-गुरुदेवपद्धति

 कामिकागम

 कर्णागम (इसमें वास्तु पर लगभग ४० अध्याय हैं। इसमें तालमान का बहुत ही वैज्ञानिक एवं

पारिभाषिक विवेचन है।)

 मनुष्यालयचंद्रिका (कुल ७ अध्याय, २१० से अधिक श्लोक)

 प्रासादमण्डन (कुल ८ अध्याय)

 राजवल्लभ (कुल १४ अध्याय)

 तंत्रसमुच्चय

 वास्तुसौख्यम् (कुल ९ अध्याय)

 विश्वकर्मा प्रकाश (कुल १३ अध्याय, लगभग १३७४ श्लोक)

 विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र (कुल ८४ अध्याय)

 सनत्कुमारवास्तुशास्त्र

 वास्तुमण्डन

 मयशास्त्र (भित्ति सजाना)

 बिम्बमान (चित्रकला)

 शुक्रनीति (प्रतिमा, मूर्ति या विग्रह निर्माण)

 सुप्रभेदगान Suprabhedagana

 विष्णुधर्मोत्तर पुराण

 आगम (इनमें भी शिल्प की चर्चा है।)

 अग्निपुराण

 ब्रह्मपुराण (मुख्यतः वास्तुशास्त्र, कुछ अध्याय कला पर भी)

 वास्तुविद्या

 प्रतिमालक्षणविधानम्

 गार्गेयम्

 मानसार शिल्पशास्त्र (कुल ७० अध्याय; ५१०० से अधिक श्लोक; कास्टिंग, मोल्डिंग, कार्विंग,

पॉलिशिंग, तथा कला एवं हस्तशिल्प निर्माण के अनेकों अध्याय)

 अत्रियम्

 प्रतिमा मान लक्षणम् (इसमें टूटीई हुई मूर्तियों को सुधारने आदि पर अध्याय है।)

 दशतल न्याग्रोध परिमण्डल

 शम्भुद्भाषित प्रतिमालक्षण विवरणम्

 मयमतम् (मयासुर द्वारा रचित, कुल ३६ अध्याय, ३३०० से अधिक श्लोक)

 बृहत्संहिता (अध्याय ५३-६०, ७७, ७९, ८६)

 शिल्परत्नम् (इसके पूर्वभाग में 46 अध्याय कला तथा भवन/नगर-निर्माण पर हैं। उत्तरभाग में ३५

अध्याय मूर्तिकला आदि पर हैं।)

 युक्तिकल्पतरु (आभूषण-कला सहित विविध कलाएँ)

 शिल्पकलादर्शनम्

 समरांगण सूत्रधार (रचयिता ; राजा भोज ; कुल ८४ अध्याय, ८००० से अधिक श्लोक)

 वास्तुकर्मप्रकाशम्

 मत्स्यपुराणम्

 गरुणपुराण

 कश्यपशिल्प (कुल ८४ अध्याय तथा ३३०० से अधिक श्लोक)

 भविष्यपुराण (मुख्यतः वास्तुशिल्प, कुछ अध्याय कला पर भी)

 अलंकारशास्त्र

 अर्थशास्त्र (खिडकी एवं दरवाजा आदि सामान्य शिल्प, इसके अलावा सार्वजनिक उपयोग की

सुविधाएँ)

 चित्रकल्प (आभूषण)

 चित्रकर्मशास्त्र

 मयशिल्पशास्त्र (तमिल में)

 विश्वकर्मा शिल्प (स्तम्भों पर कलाकारी, काष्ठकला)

 अगत्स्य (काष्ठ आधारित कलाएँ एवं शिल्प)

 मण्डन शिल्पशास्त्र (दीपक आदि)

 रत्नशास्त्र (मोती, आभूषण आदि)

 रत्नपरीक्षा (आभूषण)

 रत्नसंग्रह (आभूषण)

 लघुरत्नपरीक्षा (आभूषण आदि)

 मणिमहात्म्य (lapidary)

 अगस्तिमत (lapidary crafts)

 अनंगरंग (काम कलाएँ)

 कामसूत्र

 रतिरहस्य (कामकलाएँ)

 कन्दर्पचूणामणि (कामकलाएँ)

 नाट्यशास्त्र (फैशन तथा नाट्यकलाएँ)

 नृतरत्नावली (फैशन तथा नाट्यकलाएँ)

 संगीतरत्नाकर]] ((फैशन, नृत्य तथा नाट्यकलाएँ)

 नलपाक (भोजन, पात्र कलाएँ)

 पाकदर्पण (भोजन, पात्र कलाएँ)

 पाकविज्ञान (भोजन, पात्र कलाएँ)

 पाकार्नव (भोजन, पात्र कलाएँ)

 कुट्टनीमतम् (वस्त्र कलाएँ)

 कादम्बरी (वस्त्र कला तथा शिल्प पर अध्याय हैं)

 समयमात्रिका (वस्त्रकलाएँ)

 यन्त्रकोश (संगीत के यंत्र Overview in Bengali Language)

 संगीतरत्नाकर (संगीत से सम्बन्धित शिल्प)

 चिलपटिकारम् (Cilappatikaaram ; दूसरी शताब्दी में रचित तमिल ग्रन्थ जिसमें संगीत यंत्रों पर

अध्याय हैं)

 मानसोल्लास (संगीत यन्त्रों से सम्बन्धित कला एवं शिल्प, पाकशास्त्र, वस्त्र, सज्जा आदि)

 वास्तुविद्या (मूर्तिकला, चित्रकला, तथा शिल्प)

 उपवन विनोद (उद्यान, उपवन भवन निर्माण, घर में लगाये जाने वाले पादप आदि से सम्बन्धित

शिल्प)

 वास्तुसूत्र (संस्कृत में शिल्पशास्त्र का सबसे प्राचीन ग्रन्थ; ६ अध्याय; छबि रचाना; इसमें बताया

गया है कि छबि कलाएँ किस प्रकार हाव-भाव एवं आध्यात्मिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के

साधन हैं।)

कृषि

 कृषि पराशर (पराशर)

 कृषि संग्रह

 पराशर तंत्र

 वृक्षायुर्वेद (सुरपाल)

 कश्यपीयकृषिसूक्ति (कश्यप)

 विश्ववल्लभ (चक्रपाणि मिश्र)

 उपवनविनोद (सारंगधर)

नीतिशास्त्र

 कामन्दकीय नीतिसार

 शुक्रनीति

 अर्थशास्त्र (चाणक्य)

 नीतिशतक

इतिहास

 महावंश

 दीपवंश (द्वीपवंश)

 राजतरंगिणी -- कल्हण

 द्वितीय राजतरंगिणी - जोनराज

 हर्षचरित -- बाणभट

 विक्रमांकदेवचरित -- बिल्हण -- चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठम के राज्य के बारे में पर्याप्त

सूचना

 कुमारपालचरित -- जयसिंह --

 रामचरित -- सन्ध्याकर नन्दी

 पृथ्वीराजचरित चन्द वरदाई

यांत्रिकी

 यन्त्रसर्वस्व -- ऋषि भारद्वाज

 वैमानिकशास्त्र -- ऋषि भारद्वाज

 समरांगणसूत्रधार -- राजा भोज -- इसके यंत्रविधान नामक ३१वें अध्याय में यंत्रों के बारे में बहुत

सारी जानकारी दी गयी है। विमान पर भी जानकारी है।

 यन्त्रार्णव --

 वैशेषिक सूत्रों पर प्रशस्तिपाद भाष्य -- प्रशस्तिपाद -वेग संस्कार; न्यूटन के गति के नियमों जैसे

हैं।

भारद्वाज मुनि उनसे पूर्व हुए विमान शास्त्र के आचार्य तथा उनके ग्रंथों के बारे में लिखते हैं-

( १ ) नारायण कृत - विमान चन्द्रिका

( २ ) शौनक कृत न् व्योमयान तंत्र

( ३ ) गर्ग - यन्त्रकल्प

( ४ ) वायस्पतिकृत - यान बिन्दु

( ५ ) चाक्रायणीकृत खेटयान प्रदीपिका

( ६ ) धुण्डीनाथ - व्योमयानार्क प्रकाश

 यंत्रराज

 यंत्रशिरोमणि

कामशास्त्र

 कामसूत्र -- वात्स्यायन

इसकी तीन टीकाएँ प्रसिद्ध हैं-

·         (1) जयमंगला प्रणेता का नाम यथार्थत: यशोधर है जिन्होंने HQ (1243-61) के राज्यकाल में इसका

निर्माण किया।

·         (2) कंदर्पचूडामणि बघेलवंशी राजा रामचंद्र के पुत्र वीरसिंहदेव रचित पद्यबद्ध टीका (रचनाकाल सं.

1633; 1577 ई.)।

·         (3) कामसूत्रव्याख्या — भास्कर नरसिंह नामक काशीस्थ विद्वान् द्वारा 1788 ई. में निर्मित टीका।


Pandita  Part
 
 Vastuvidya (silpa)
 


 
 
 Paribhashavritti (Vyakarana) Nilakanta Diskhita
 
 Sphotasidhinyayavichara (Vyakarana)
 
 Mattavilasaprahasana (Nataka) Mahendravikramavarman
 
 Manushyalayachandrika (Silpa) 
 

संस्कृत ज्ञान विज्ञानं की भाषा








संस्कृत हज़ारो वर्षसे इस देश की राष्ट्रभाषा रही हे। यहाँ का सारा साहित्य संस्कृतमय हे, यहां के निवासी की क्रियाकलाप की यही भाषा हे। इस देश की सभ्यता एवं संस्कृति की पवित्र धारा इसी भाषा में निरंतर बहती रही हो। वह भाषा इस देश में कदापि मृत नहीं हो सकती।

अंग्रेजी शिक्षण व्यवस्था से सदा के लिए इस सम्पूर्ण वैज्ञानिक भाषा की उपेक्षा की गयी। जेसे अपने बेटे द्वारा माँ का परित्याग हुआ हो। फिर भी इस देश में समय समय पर भारत माँ के सपूत ने जन्म लिया और इसके महत्व को समजाया और आज तो यह हो गया हे की पुरे विश्व ने इसको मान लिया।

संसार की समस्त प्राचीनतम भाषाओं में संस्कृत का सर्वोच्च स्थान है। विश्व-साहित्य की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद संस्कृत में ही रची गई है। संपूर्ण भारतीय संस्कृति, परंपरा और महत्वपूर्ण राज इसमें निहित है। अमरभाषा या देववाणी संस्कृत को जाने बिना भारतीय संस्कृति की महत्ता को जाना नहीं जा सकता। 

देश-विदेश के कई बड़े विद्वान संस्कृत के अनुपम और विपुल साहित्य को देखकर चकित रह गए हैं। कई विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक रीति से इसका अध्ययन किया और गहरी गवेषणा की है। समस्त भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी यदि कोई भाषा है तो वह संस्कृत ही है।
संस्कृत साहित्य का महत्व

विश्वभर की समस्त प्राचीन भाषाओं में संस्कृत का सर्वप्रथम और उच्च स्थान है। विश्व-साहित्य की पहली पुस्तक ऋग्वेद इसी भाषा का देदीप्यमान रत्न है। संस्कृत का अध्ययन किये बिना भारतीय संस्कृति का पूर्ण ज्ञान कभी सम्भव नहीं है।

अनेक प्राचीन एवं अर्वाचीन भाषाओं की यह जननी है। आज भी भारत की समस्त भाषाएँ इसी वात्सल्यमयी जननी के स्तन्यामृत से पुष्टि पा रही हैं।
 
ऋग्वेदसंहिता : सबसे पुराना ग्रंथ
ऋग्वेदसंहिता के कतिपय मंडलों की भाषा संस्कृतवाणी का सर्वप्राचीन उपलब्ध स्वरूप है। ऋग्वेदसंहिता इस भाषा का पुरातनतम ग्रंथ है। यहाँ यह भी स्मरण रखना चाहिए कि ऋग्वेदसंहिता केवल संस्कृतभाषा का प्राचीनतम ग्रंथ नहीं है - अपितु वह आर्य जाति की संपूर्ण ग्रंथराशि में भी प्राचीनतम ग्रंथ है। ऋग्वेदकाल से लेकर आज तक उस भाषा की अखंड परंपरा चली रही है। ऋक्संहिता केवल भारतीय की ही अमूल्य निधि नहीं है - वह समग्र आर्यजाति की, समस्त विश्ववाङ्मय की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विरासत है।

भारत के वैदिक ऋषियों और विद्वानों ने अपने वैदिक वाङ्मय को मौखिक और श्रुतिपरंपरा द्वारा प्राचीनतम रूप में अत्यंत सावधानी के साथ सुरक्षित और अधिकृत अनाए रखा। किसी प्रकार के ध्वनिपरक, मात्रापरक यहाँ तक कि स्वर (ऐक्सेंट) परक परिवर्तन से पूर्णत: बचाते रहने का नि:स्वार्थ भाव में वैदिक वेदपाठी सहस्रब्दियों तक अथक प्रयास करते रहे। "वेद" शब्द से मंत्रभाग (संहिताभाग) और "ब्राह्मण" का बोध माना जाता था। "ब्राह्मण" भाग के तीन अंश - (1) ब्राह्मण, (2) आरण्यक और (3) उपनिषद् कहे गए हैं। लिपिकला के विकास से पूर्व मौखिक परंपरा द्वारा वेदपाठियों ने इनका संरक्षण किया। बहुत सा वैदिक वाङ्मय धीरे-धीरे लुप्त हो गया है। पर आज भी जितना उपलब्ध है उसका महत्व असीम है। भारतीय दृष्टि से वेद को अपौरुषेय माना गया है। कहा जाता है, मंत्रद्रष्टा ऋषियों ने मंत्रों का साक्षात्कार किया। आधुनिक जगत् इसे स्वीकार नहीं करता। फिर भी यह माना जाता है किवेदव्यास ने वैदिक मंत्रों का संकलन करते हुए संहिताओं के रूप में उन्हें प्रतिष्ठित किया। अत: संपूर्ण भारतीय संस्कृति वेदव्यास की युग-युग तक ऋणी बनी रहेगी।


वेद, वेदांग, उपवेद

यहाँ साहित्य शब्द का प्रयोग "वाङ्मय" के लिए है। ऊपर वेद संहिताओं का उल्लेख हुआ है। वेद चार हैं-ऋग्वेदयजुर्वेदसामवेद  अथर्ववेद। इनकी अनेक शाखाएँ थीं जिनमें बहुत सी लुप्त हो चुकी हैं और कुछ सुरक्षित बच गई हैं जिनके संहिताग्रंथ हमें आज उपलब्ध हैं। इन्हीं की शाखाओं से संबद्ध ब्राह्मण, अरण्यक और उपनिषद् नामक ग्रंथों का विशाल वाङ्मय प्राप्त है। वेदांगों में सर्वप्रमुख कल्पसूत्र हैं जिनके अवांतर वर्गों के रूप में और सूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र (शुल्बसूत्र भी है) का भी व्यापक साहित्य बचा हुआ है। इन्हीं की व्याख्या के रूप में समयानुसार धर्मसंहिताओं और स्मृतिग्रंथों का जो प्रचुर वाङ्मय बना, मनुस्मृति का उनमें प्रमुख स्थान है। वेदांगों में शिक्षा-प्रातिशाख्य, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छंद शास्त्र से संबद्ध ग्रंथों का वैदिकोत्तर काल से निर्माण होता रहा है। अब तक इन सबका विशाल साहित्य उपलब्ध है। आज ज्योतिष की तीन शाखाएँ-गणित, सिद्धांत और फलित विकसित हो चुकी हैं और भारतीय गणितज्ञों की विश्व की बहुत सी मौलिक देन हैं। पाणिनि और उनसे पूर्वकालीन तथा परवर्ती वैयाकरणों द्वारा जाने कितने व्याकरणों की रचना हुई जिनमें पाणिनि का व्याकरण-संप्रदाय 2500 वर्षों से प्रतिष्ठित माना गया और आज विश्व भर में उसकी महिमा मान्य हो चुकी है। पाणिनीय व्याकरण को त्रिमुनि व्याकरण भी कहते हैं, क्योकि पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि इन तीन मुनियों के सत्प्रयास से यह व्याकरण पूर्णता को प्राप्त किया। यास्क का निरुक्त पाणिनि से पूर्वकाल का ग्रंथ है और उससे भी पहले निरुक्तिविद्या के अनेक आचार्य प्रसिद्ध हो चुके थे। शिक्षाप्रातिशाख्य ग्रंथों में कदाचित् ध्वनिविज्ञान, शास्त्र आदि का जितना प्राचीन और वैज्ञानिक विवेचन भारत की संस्कृत भाषा में हुआ है- वह अतुलनीय और आश्चर्यकारी है। उपवेद के रूप में चिकित्साविज्ञान के रूप में आयुर्वेद विद्या का वैदिकाल से ही प्रचार था और उसके पंडिताग्रंथ (चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, भेडसंहिता आदि) प्राचीन भारतीय मनीषा के वैज्ञानिक अध्ययन की विस्मयकारी निधि है। इस विद्या के भी विशाल वाङ्मय का कालांतर में निर्माण हुआ। इसी प्रकार धनुर्वेद और राजनीति, गांधर्ववेद आदि को उपवेद कहा गया है तथा इनके विषय को लेकर ग्रंथ के रूप में अथवा प्रसंगतिर्गत सन्दर्भों में पर्याप्त विचार मिलता है।

दर्शनशास्त्र

वेद, वेदांग, उपवेद आदि के अतिरिक्त संस्कृत वाङ्मय में दर्शनशास्त्र का वाङ्मय भी अत्यंत विशाल है। पूर्वमीमांसा, उत्तर मीमांसा, सांख्य, योग, वैशेषिक और न्याय-इन छह प्रमुख आस्तिक दर्शनों के अतिरिक्त पचासों से अधिक आस्तिक-नास्तिक दर्शनों के नाम तथा उनके वाङ्मय उपलब्ध हैं जिनमें आत्मा, परमात्मा, जीवन, जगत्पदार्थमीमांसा, तत्वमीमांसा आदि के सन्दर्भ में अत्यंत प्रौढ़ विचार हुआ है। आस्तिक षड्दर्शनों के प्रवर्तक आचार्यों के रूप में व्यास, जैमिनि, कपिल, पतंजि, कणाद, गौतम आदि के नाम संस्कृत साहित्य में अमर हैं। अन्य आस्तिक दर्शनों में शैव, वैष्णव, तांत्रिक आदि सैकड़ों दर्शन आते हैं। आस्तिकेतर दर्शनों में बौद्धदर्शनों, जैनदर्शनों आदि के संस्कृत ग्रंथ बड़े ही प्रौढ़ और मौलिक हैं। इनमें गंभीर विवेचन हुआ है तथा उनकी विपुल ग्रंथराशि आज भी उपलब्ध है। चार्वाक, लोकायतिक, गार्हपत्य आदि नास्तिक दर्शनों का उल्लेख भी मिलता है। वेदप्रामण्य को माननेवाले आस्तिक और तदितर नास्तिक के आचार्यों और मनीषियों ने अत्यंत प्रचुर मात्रा में दार्शनिक वाङ्मय का निर्माण किया है। दर्शन सूत्र के टीकाकार के रूप में परमादृत शंकराचार्य का नाम संस्कृत साहित्य में अमर है।

लौकिक साहित्य

कौटिल्य का अर्थशास्त्र, वात्स्यायन का कामसूत्र, भरत का नाट्य शास्त्र आदि संस्कृत के कुछ ऐसे अमूल्य ग्रंथरत्न हैं - जिनका समस्त संसार के प्राचीन वाङ्मय में स्थान है। श्रीमद्भगवद्गीता का संसार में कहा जाता है - बाईबिल के बाद सर्वाधिक प्रचार है तथा विश्व की उत्कृष्टतम कृतियों में उसका उच्च और अन्यतम स्थान है।

वैदिक वाङ्मय के अनंतर सांस्कृतिक दृष्टि से वाल्मीकिके रामायण और व्यास के महाभारत की भारत में सर्वोच्च प्रतिष्ठा मानी गई है। महाभारत का आज उपलब्ध स्वरूप एक लाख पद्यों का है। प्राचीन भारत की पौराणिक गाथाओं, समाजशास्त्रीय मान्यताओं, दार्शनिक आध्यात्मिक दृष्टियों, मिथकों, भारतीय ऐतिहासिक जीवनचित्रों आदि के साथ-साथ पौराणिक इतिहास, भूगोल और परंपरा का महाभारत महाकोश है। वाल्मीकि रामायण आद्य लौकिक महाकाव्य है। उसकी गणना आज भी विश्व के उच्चतम काव्यों में की जाती है। इनके अतिरिक्त अष्टादश पुराणों और उपपुराणादिकों का महाविशाल वाङ्मय है जिनमें पौराणिक या मिथकीय पद्धति से केवल आर्यों का ही नहीं, भारत की समस्त जनता और जातियों का सांस्कृति इतिहास अनुबद्ध है। इन पुराणकार मनीषियों ने भारत और भारत के बाहर से आयात सांस्कृति एवं आध्यात्मिक ऐक्य की प्रतिष्ठा का सहस्राब्दियों तक सफल प्रयास करते हुए भारतीय सांस्कृति को एकसूत्रता में आबद्ध किया है।

संस्कृत के लोकसाहित्य के आदिकवि वाल्मीकि के बाद गद्य-पद्य के लाखों श्रव्यकाव्यों और दृश्यकाव्यरूप नाटकों की रचना होती चली जिनमें अधिकांश लुप्त या नष्ट हो गए। पर जो स्वल्पांश आज उपलब्ध है, सारा विश्व उसका महत्व स्वीकार करता है। कवि कालिदासके अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक को विश्व के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में स्थान प्राप्त है। अश्वघोष, भास, भवभूति, बाणभट्ट, भारवि, माघ, श्रीहर्ष, शूद्रक, विशाखदत्त आदि कवि और नाटककारों को अपने अपने क्षेत्रों में अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। सर्जनात्मक
संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यन्त परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। बहुत प्राचीन काल से ही अनेक व्याकरणाचार्यों ने संस्कृत व्याकरण पर बहुत कुछ लिखा है। किन्तु पाणिनि का संस्कृत व्याकरण पर किया गया कार्य सबसे प्रसिद्ध है। उनका अष्टाध्यायी किसी भी भाषा के व्याकरण का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है।

ध्वनि-तन्त्र और लिपि

ऐसी भाषा है जिसमें आकृति और ध्वनि का आपस में संबंध होता है। उदाहरण के लिए अंग्रेजी में अगर आप ‘son’ या ‘sun’ का उच्चारण करें, तो ये दोनों एक जैसे सुनाई देंगे, बस वर्तनी में ये अलग हैं। आप जो लिखते हैं, वह मानदंड नहीं है, मानदंड तो ध्वनि है क्योंकि आधुनिक विज्ञान यह साबित कर चुका है कि पूरा अस्तित्व ऊर्जा की गूंज है। जहां कहीं भी कंपन है, वहां ध्वनि तो होनी ही है। इसलिए एक तरह से देखा जाय तो पूरा अस्तित्व ध्वनि है। जब आप को यह अनुभव होता है कि एक खास ध्वनि एक खास आकृति के साथ जुड़ी हुई है, तो यही ध्वनि उस आकृति के लिए नाम बन जाती है। अब ध्वनि और आकृति आपस में जुड़ गईं। अगर आप ध्वनि का उच्चारण करते हैं, तो दरअसल, आप आकृति की ही चर्चा कर रहे हैं, सिर्फ अपनी समझ में, केवल मनोवैज्ञानिक रूप से, बल्कि अस्तित्वगत रूप से भी आप आकृति को ध्वनि से जोड़ रहे हैं। अगर ध्वनि पर आपको महारत हासिल है, तो आकृति पर भी आपको महारत हासिल होगी। तो संस्कृत भाषा हमारे अस्तित्व की रूपरेखा है। जो कुछ भी आकृति में है, हमने उसे ध्वनि में परिवर्तित कर दिंया। आजकल इस मामले में बहुत ज्यादा विकृति गई है। यह एक चुनौती है कि मौजूदा दौर में इस भाषा को संरक्षित कैसे रखा जाए। इसकी वजह यह है कि इसके लिए जरूरी ज्ञान, समझ और जागरूकता की काफी कमी है।
यही वजह है कि जब लोगों को संस्कृत भाषा पढ़ाई जाती है, तो उसे रटाया जाता है। लोग शब्दों का बार बार उच्चारण करते हैं। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि उन्हें इसका मतलब समझ आता है या नहीं, लेकिन ध्वनि महत्वपूर्ण है, अर्थ नहीं।

संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन आधुनिक युग में देवनागरी लिपि के साथ इसका विशेष संबंध है। देवनागरी लिपि वास्तव में संस्कृत के लिये ही बनी है, इसलिये इसमें हरेक चिह्न के लिये एक और केवल एक ही ध्वनि है। देवनागरी में १३ स्वर और ३४ व्यंजन हैं। देवनागरी से रोमन लिपि में लिप्यन्तरण के लिये दो पद्धतियाँ अधिक प्रचलित हैं : IAST और ITRANS. शून्य, एक या अधिक व्यंजनों और एक स्वर के मेल से एक अक्षर बनता है।

संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ है। संसार की समृद्धतम भाषासंस्कृतके रूप में सबसे उन्नत मानवीय समाज और विज्ञान की स्थापना की गयी। इस देवभाषा के अध्ययन मनन मात्र से ही मनुष्य में सूक्ष्म विचारशीलता और मौलिक चिंतन जन्म लेता है। सनातन संस्कृति के सभी प्रमुख साहित्यिक और वैज्ञानिक शास्त्र संस्कृत भाषा में ही हैं।

भारतीय शिक्षण-शैली को समाप्त करने के बाद मैकाले द्वारा भारतीयों सेभारतीयताको नष्ट करने का जो षड्यंत्र रचा गया. दुर्भाग्य से हम उसमे बुरी तरह फँस गए. फलस्वरूप तथाकथित आधुनिक या आंग्लभाषी शिक्षा-पद्धति से शिक्षित लोग अज्ञानतावश संस्कृत को सिर्फ पूजा-पाठ और कर्मकाण्डो से जुड़ा मानकर अवैज्ञानिक तथा अनुपयोगी मानने लगे। जबकि वास्तविकता यह है कि यह भाषा महज साहित्य, दर्शन और अध्यात्म तक ही सीमित नहीं है,अपितु गणित, विज्ञान, औषधि, चिकित्सा, इतिहास, मनोविज्ञान, भाषाविज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे अनन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कम्पयूटर क्षेत्र में भी संस्कृत के प्रयोग की सम्भावनाओं पर फ्रांस, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इंग्लैंड आदि विभिन्न देशों में शोध जारी है। वानस्पतिक सौंदर्य प्रसाधन (हर्बल कॉस्मैटिक्स) एवं आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के तेजी से बढ़ते प्रचलन से संस्कृत की उपयोगिता और बढ़ गयी है क्योंकि आयुर्वेद पद्धतियों का ज्ञान सिर्फ संस्कृत में ही लिपिबद्ध है।

अपनी सुस्पष्ट और छंदात्मक उच्चारण प्रणाली के चलते संस्कृत भाषा कोस्पीच थेरेपी टूल’ (भाषण चिकित्सा उपकरण) के रूप में मान्यता मिल रही है। जर्मन शिक्षाविद् पॉल मॉस के अनुसारसंस्कृत से सेरेब्रेल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है। अतएव किसी बालक के लिए उँगलियों और जुबान की कठोरता से मुक्ति पाने के लिए देवनागरी लिपि संस्कृत बोली ही सर्वोत्तम मार्ग है। वर्तमान यूरोपीय भाषाएँ बोलते समय जीभ और मुँह के कई हिस्सों का और लिखते समय उँगलियों की कई हलचलों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है”.

वैज्ञानिक कई दिनों तक ऐसी भाषा/लिपि के विकास में थे, जिसका संगणकीय प्रणाली में उपयोग कर, उसका संसार की किसी भी आठ भाषाओं मे उसी क्षण रूपांतर हो जाए। अंततोगत्वासंस्कृतही एकमात्र ऐसी भाषा नजर आई। फोर्ब्स पत्रिका 1985 के अंक के अनुसार दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है।

वर्तमान में ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और कोलम्बिया जैसे 200 से भी ज्यादा लब्ध-प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ायी जा रही है। नासा के पास 60,000 ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियों है जो वे अध्ययन का उपयोग कर रहे हैं माना जाता है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं।

लंदन और आयरलैण्ड में वहां की शिक्षा में शामिल होने वाली संस्कृत अपनी ही जमीन पर तीसरी भाषा के स्थान पर स्वीकार की गई है। भारत की वर्तमान एवं भावी पीढ़ी अत्यंत संवेदनशील है। उन्हें संस्कृत की महानता समझने और समझाने की जरूरत है। अगर स्मृति तीव्र करना हो तो, ब्लड सर्कुलेशन संतुलित करना हो तो और जीभ की मांसपेशियों का व्यायाम कराना हो तो, सभी स्थितियों में संस्कृत शब्दों का उच्चारण करना चाहिए। 
 
दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के लिए है। जो हैं भी वहाँ संस्कृत केवल साहित्य और कर्मकाण्ड तक सीमित है विज्ञान के रूप में नहीं। भारत को विश्वगुरु और विश्व में सिरमौर बनाने के लिए संस्कृत के पुनरुत्थान की आवश्यकता है। क्योंकि संस्कृत हमारी विरासत है और उस पर हमारा ही जन्म-सिद्ध अधिकार है।

नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स ने 1985 में भारत से संस्कृत के एक हजार प्रकांड विद्वानों को बुलाया था। उन्हें नासा में नौकरी का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने बताया कि संस्कृत ऐसी प्राकृतिक भाषा है, जिसमें सूत्र के रूप में कंप्यूटर के जरिए कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में भेजा जा सकता है। विदेशी उपयोग में अपनी भाषा की मदद देने से उन विद्वानों ने इन्कार कर दिया था।

नासा के वैज्ञानिकों की मानें तो जब वह स्पेस ट्रैवलर्स को मैसेज भेजते थे तो उनके वाक्य उलटे हो जाते थे। इस वजह से मेसेज का अर्थ ही बदल जाता था। उन्होंने दुनिया के कई भाषा में प्रयोग किया लेकिन हर बार यही समस्या आई। आखिर में उन्होंने संस्कृत में मेसेज भेजा क्योंकि संस्कृत के वाक्य उलटे हो जाने पर भी अपना अर्थ नहीं बदलते हैं। यह रोचक जानकारी हाल ही में एक समारोह में दिल्ली सरकार के प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के निदेशक डॉ. जीतराम भट्ट ने दी।

संस्कृत भाषा वर्तमान मेंउन्नत किर्लियन फोटोग्राफीतकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। (वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आजसरल किर्लियन फोटोग्राफीभी नहीं है.

भारतीय वैज्ञानिकों को नव अनुसंधान की प्रेरणा संस्कृत से मिली. जगदीशचन्द्र बसु, चंद्रशेखर वेंकट रमण ,आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय, डॉ. मेघनाद साहा जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिकों को संस्कृत भाषा से अत्यधिक प्रेम था और वैज्ञानिक खोजों के लिए वे संस्कृत को ही आधार मानते थे। इनके अनुसार संस्कृत का प्रत्येक शब्द वैज्ञानिकों को अनुसंधान के लिए प्रेरित करता है। प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने विज्ञान में जितनी उन्नति की थी, वर्तमान में उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। महर्षियों का सम्पूर्ण ज्ञान एवं सार संस्कृत भाषा में निहित है। आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय विज्ञान के लिए संस्कृत शिक्षा को आवश्यक मानते थे। जगदीशचन्द्र बसु ने अपने अनुसंधानों के स्रोत संस्कृत में खोजे थे। डॉ. साहा अपने घर के बच्चों की शिक्षा संस्कृत में ही कराते थे और एक वैज्ञानिक होने के बावजूद काफी समय तक वे स्वयं बच्चों को संस्कृत पढ़ाते थे।

आधुनिक विज्ञान सृष्टि के रहस्यों को सुलझाने में बौना पड़ रहा है। अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न मंत्र-विज्ञान की महिमा से आज का विज्ञान भी अनभिज्ञ है। उड़न तश्तरियाँ कहाँ से आती हैं और कहाँ गायब हो जाती हैं इस प्रकार की कई बातें हैं जो आज भी विज्ञान के लिए रहस्य बनी हुई हैं। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों से ऐसे कई रहस्यों को सुलझाया जा सकता है।

आर्यभट्ट का शून्य सिद्धांत, कणाद ऋषि का परमाणु सिद्धांत और भास्कराचार्य का सूर्य सिद्धांत होता तो शायद विज्ञान आज इस शिखर पर होता। विमान विज्ञान, नौका विज्ञान से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हमारे ग्रंथों से प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार के और भी अनगिनत सूत्र हमारे ग्रंथों में समाये हुए हैं, जिनसे आधुनिक विज्ञान को अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण दिशानिर्देश मिल सकते हैं। आज अगर विज्ञान के साथ संस्कृत का समन्वय कर दिया जाय तो अनुसंधान के क्षेत्र में बहुत उन्नति हो सकती है। हिन्दू धर्म के प्राचीन महान ग्रंथों के अलावा बौद्ध, जैन आदि धर्मों के अनेक मूल धार्मिक ग्रंथ भी संस्कृत में ही हैं। संस्कारी जीवन की नींवः संस्कृत वर्तमान समय में भौतिक सुख-सुविधाओं का अम्बार होने के बावजूद भी मानव-समाज अवसाद, तनाव, चिंता और अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त है क्योंकि केवल भौतिक उन्नति से मानव का सर्वांगीण विकास सम्भव नहीं है, इसके लिए आध्यात्मिक उन्नति अत्यंत जरूरी है। जिस समय संस्कृत का बोलबाला था उस समय मानव-जीवन ज्यादा संस्कारित था। यदि समाज को फिर से वैसा संस्कारित करना हो तो हमें फिर से सनातन धर्म के प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का सहारा लेना ही पड़ेगा।

संस्कृत के बारे में आज की पीढ़ी के लिए आश्चर्यजनक तथ्य ————-

कंप्यूटर में इस्तेमाल के लिए सबसे अच्छी भाषा।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1987

सबसे अच्छे प्रकार का कैलेंडर जो इस्तेमाल किया जा रहा है, हिंदू कैलेंडर है (जिसमें नया साल सौर प्रणाली के भूवैज्ञानिक परिवर्तन के साथ शुरू होता है)

संदर्भ: जर्मन स्टेट यूनिवर्सिटी

दवा के लिए सबसे उपयोगी भाषा अर्थात संस्कृत में बात करने से व्यक्ति स्वस्थ और बीपी, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल आदि जैसे रोग से मुक्त हो जाएगा। संस्कृत में बात करने से मानव शरीर का तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश(Positive Charges) के साथ सक्रिय हो जाता है।

संदर्भ: अमेरीकन हिन्दू यूनिवर्सिटी (शोध के बाद)

संस्कृत वह भाषा है जो अपनी पुस्तकों वेद, उपनिषदों, श्रुति, स्मृति, पुराणों, महाभारत, रामायण आदि में सबसे उन्नत प्रौद्योगिकी(Technology) रखती है।

संदर्भ: रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी, नासा आदि


(असत्यापित रिपोर्ट का कहना है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं। दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्तकरने के लिए है।

दुनिया की सभी भाषाओं की माँ संस्कृत है। सभी भाषाएँ (97%) प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस भाषा से प्रभावित है।
संदर्भ: यूएनओ

दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1985

लेकिन यहाँ यह बात अवश्य सोचने की है,की आज जहाँ पूरे विश्व में संस्कृत पर शोध चल रहे हैं,रिसर्च हो रहीं हैं वहीँ हमारे देश संस्कृत को मृत भाषा बताने में बाज नहीं रहे हैं .


સ્વાસ્થ્ય સંવાદ

સ્વાસ્થ્ય સવાંદ ગ્રુપ ની તારીખ 18 - Aug - 20, સાંજે 8.30 થી 10.00 વાગ્યા સુધી સ્વસ્થ કેમ રહેવું અને આહાર વિહાર માં જે કાળજી લેવી એના પર હું ...