Tuesday, 21 June 2016

विश्व को भारत की अमूल्य भेट - योग




भारत की विश्व को अनगिनत अमूल्य भेट हे। पर जून महीना विशेष रूप से योग के सम्बन्ध में हे जो UNO ने 21 जून विश्व योग दिवस के रूप में स्थापित किया हे। यह गर्व की बात से ज्यादा विश्व के कल्याण की बात हे अगर सही मायने में पूरा विश्व अपने जीवन में उतारे।

इसी सन्दर्भ में जब विश्व ने योग को और उसके महत्व को स्वीकारा तो हम भारत वाशी को जीवन की हर क्षण योगमय हो यह हमारे लिए अति महत्वपूर्ण एवम् कल्याण कारी भी हे।

योग का अर्थ:

‘योग’ शब्द ‘युज समाधौ’ आत्मनेपदी दिवादिगणीय धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। इस प्रकार ‘योग’ शब्द का अर्थ हुआ- समाधि अर्थात् चित्त वृत्तियों का निरोध। वैसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योग’ तथा ‘युज संयमने’ धातु से भी निष्पन्न होता है किन्तु तब इस स्थिति में योग शब्द का अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ तथा नियमन होगा। आगे योग में हम देखेंगे कि आत्मा और परमात्मा के विषय में भी योग कहा गया है।

योग सब धर्म से ऊपर हे। वह हर धर्म के लिए हे। यह शाश्त्र मानव के कल्याण के लिए बनाया हे और उस से आगे उसके अर्थ अनुसार सृष्टि के रचना से जो जुड़ना हे; परमपिता से मिलना यही योग हे।

योग का इतिहास:

ऐसा माना जाता है कि जब से सभ्‍यता शुरू हुई है तभी से योग किया जा रहा है। योग के विज्ञान की उत्‍पत्ति हजारों साल पहले हुई थी, पहले धर्मों या आस्‍था के जन्‍म लेने से काफी पहले हुई थी। योग विद्या में शिव को पहले योगी या आदि योगी तथा पहले गुरू या आदि गुरू के रूप में माना जाता है।

संसार की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद में योग का उल्लेख:

'यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन। स धीनां योगमिन्वति।।-ऋक्संहिता, मंडल-1, सूक्त-18, मंत्र-7।

अर्थात- योग के बिना विद्वान का भी कोई यज्ञकर्म सिद्ध नहीं होता। वह योग क्या है? योग चित्तवृत्तियों का निरोध है, वह कर्तव्य कर्ममात्र में व्याप्त है।

भारतीय दर्शन में, षड् दर्शनों में से एक का नाम योग है। योग दार्शनिक प्रणाली हे।

योग विद्या के भगवान् श्री पंतजलि ऋषि ने योगविद्या को सुव्यवस्थित किया और योग सूत्र नाम की अमूल्य भेट विश्व को मानव कल्याण के लिए दी।

फिर भारत के काफि महापुरुषों ने समय समय पर शारीरिक, मानसिक एवम् अध्यतामिक विकास के लिए लोगो के समक्ष प्रस्तुत करते रहे और हज़ारो साल के बाद भी हमे योग का लाभ हमे मिल रहा हे।

ऐसे महान ऋषि इसके पंतजलि भगवान के वंदन में श्लोक:

योगेन चित्तस्य पदेन वाचा मलं शारीरस्य च वैद्यकेन्।
योह्यपाकरोत्तम् प्रवरम मुनीनां प्रंजलि प्रांजलिनतोह्यस्मि।।

अर्थात चित्त की शुद्धि के लिए योग ,वाणी की शुद्धि के लिए व्याकरण और शरीर की शुद्धि के लिए वैदयकशास्त्र के ऋषि पतंजलि को प्रणाम।

पतांजलि का लेखन 'अष्टांग योग"("आठ-अंगित योग") एक प्रणाली के लिए आधार बन गया।

सूत्र से यह आठ-अंगित अवधारण को प्राप्त किया गया था और व्यावहारिक रूप मे भिन्नरूप से सिखाये गए प्रत्येक राजा योग का एक मुख्य विशेषता है।

योग के आठ अंग हैं:

यम : - - सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रम्हचर्य।

नियम (पांच "धार्मिक क्रिया"): पवित्रता, संतुष्टि, तपस्या, अध्ययन और भगवान को आत्मसमर्पण.

आसन (विविध शारीरक व्यायाम)

प्राणायाम ("सांस को नियंत्रित करना"):

प्राणाप्रत्यहार ("अमूर्त"):बाहरी वस्तुओं से भावना अंगों के प्रत्याहार.

धारणा ("एकाग्रता"): एक ही लक्ष्य पर ध्यान लगाना.

ध्यान : केवल एक वस्तु पर ध्यान केन्द्रित कर अन्य सभी बाह्य वास्तु का ज्ञान तथा उनकी स्मृति न होने की स्तिथि को ध्यान कहा जाता हैं।

समाधि (परमब्रम्ह में स्थित)

योग के शाश्त्रो द्वारा विभिन्न अर्थघटन:

- श्रीकृष्ण, श्रीमद् भगवद्गीता:
योग: कर्मसु कौशलम्‌' (योग से कर्मो मे कुशलता आती हैं)

-  पातंजल योग दर्शन:
योगश्चित्तवृत्त निरोध(चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।)

- सांख्य दर्शन:

 पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते। (पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है।)

- विष्णुपुराण:

योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने
(जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है।)

योग से रोग में लाभः

1 क्षय और दमा :

- सिद्धाशन, सर्वांगाशन, मत्स्याशन और भुजंगाशन

2 मधुप्रमेह :

- सिद्धाशन, सर्वांगाशन, मत्स्याशन, हलाशन, चक्राशन और भुजंगाशन

3 क्रोनिक ब्रोनकाटिस, श्वास

- मत्स्याशन और शलभाषण

4 पाचनक्रिया

- सर्वांगाशन, वज्राशन और पशिचमोतानांशन

5 कब्ज

- हलाशन, मयूराशन, धनुराशन और मत्स्यासन

6 हाई ब्लड प्रेशर

- वज्राशन, सिद्धाशन, पध्माशन, मत्स्याशन और सवाशन

7  लौ ब्लड प्रेशर

- सर्वांगाशन, हलाशन, वज्राशन, पध्माशन, और सिद्धाशन

8 गले की तकलीफ

- मत्स्याशन, सर्वांगशन

9 हर्निया (सारणगांठ)

- पवन्मुक्ताशन, मत्स्याशन और सर्वांगशन

10 हृदय रोग

- सवाशन, सिद्धाशन

11 अनिद्रा

- सर्वांगशन, सवाशन,

12 आंतो के रोग

- लोलाशान, सूर्यनमस्कार

13 कमर दर्द

- वक्राशन, हलाशन, सूर्यनमस्कार

14 पथरी

- मत्स्याशन, वज्राशन

15 लकवा(परलीसिसि)

- पद्माशन, विराशन, मत्स्याशन, सिद्धाशन

- प्राणायाम: आसन के बाद प्राणायाम भी अति महत्व का अंग हे। उसका महत्व व्यास भाष्य में लिखा हे:

"तपो न परम् प्राणायामात। ततो विशुद्धिमलानाम् दह्यन्ते दोषा: प्राणस्य निग्रहात।।

अर्थात प्राणायाम से बड़ा कोई तप नहीं उससे मल दूर होता हे और ज्ञान का उदय होता हे।

इसी तरह मनु ने भी प्राणायाम का महत्व समजाया हे।

"दह्यन्ते ध्मायमानानां धातुनाम ही यथा मला:।
तथेन्द्रीयाणां दह्यन्ते दोषा: प्राणस्य निग्रहात।।

अर्थात जेसे अग्नि में सोने को पिगलने से मेल दूर होता हे। ऐसे ही प्राणायम से शरीर की इन्द्रियों का मेल दूर होता हे।

प्राणायाम के फायदे:

1  आयु बढ़ती हे, स्मरण शक्ति बढ़ती हे, मानसिक तनाव दूर होता हे।

2  हर अंग कार्यक्षम बनता हे, नाड़ी शुद्ध होती हे।

3  जठराग्नि प्रदीप्त होती हे। शरीर तंदुरस्त रहता हे।

4  ज्ञानतंत्र को शक्ति मिलती हे, मन की चंचलता दूर होती हे। एकाग्रता बढ़ती हे।

5  आध्यत्मिक शक्ति जगती हे। मानसिक विकास होता हे।

योग से मानसिक तंदुरस्ती:

यह प्रमाणित तथ्य हैं की योग मुद्रा, ध्यान और योग में श्वसन की विशेष क्रियाओं द्वारा तनाव से राहत मिलती है, योग मन को विभिन्न विषयों से हटाकर स्थिरता प्रदान करता है और कार्य विशेष में मन को स्थिर करने में सहायक होता है.

तनाव से मुक्ति:

तनाव अपने आप में एक बीमारी है जो कई अन्य बीमारियों को निमंत्रण देता है. इस तथ्य को चिकित्सा विज्ञान भी स्वीकार करता है. योग का एक महत्वपूर्ण फायदा यह है कि यह तनाव से मुक्ति प्रदान करता है. योग मुद्रा, ध्यान और योग में श्वसन की विशेष क्रियाओं द्वारा तनाव से राहत मिलती है, यह प्रमाणित तथ्य है. योग मन को विभिन्न विषयों से हटाकर स्थिरता प्रदान करता है और कार्य विशेष में मन को स्थिर करने में सहायक होता है. तनाव मुक्त होने से शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. कार्य करने की क्षमता भी बढ़ती है.

मानसिक क्षमताओं का विकास (Mental Functions improvement through Yoga)

स्मरण शक्ति एवं बौद्धिक क्षमता जीवन में प्रगति के लिए प्रमुख साधन माने जाते हैं. योग से मानसिक क्षमताओं का विकास होता है और स्मरण शक्ति पर भी गुणात्मक प्रभाव होता है. योग मुद्रा और ध्यान मन को एकाग्र करने में सहायक होता है. एकाग्र मन से स्मरण शक्ति का विकास होता है. प्रतियोगिता परीक्षाओं में तार्किक क्षमताओं पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं. योग तर्क शक्ति का भी विकास करता है एवं कौशल को बढ़ता है. योग की क्रियाओं द्वारा तार्किक शक्ति एवं कार्य कुशलता में गुणात्मक प्रभाव होने से आत्मविश्वास भी बढ़ता है.

शरीर में लोच (Physical Functions improvement through Yoga)

योग से शरीर मजबूत और लचीला होता है. योग मांसपेशियों को सुगठित और शरीर को संतुलित रखता है. सुगठित और संतुलित और लोचदार शरीर होने से कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है. कुछ योग मुद्राओं से शरीर की हड्डियां भी पुष्ट और मजबूत होती हैं. यह अस्थि सम्बन्धी रोग की संभावनाओं को भी कम करता है.

- यम, नियम आशन प्राणायाम से आगे फिर प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि योग का चरण हे जो आगे आध्यात्मिक शक्ति को जगाके परमात्मा से जुड़ने का योग बनाता हे और यह 

સ્વાસ્થ્ય સંવાદ

સ્વાસ્થ્ય સવાંદ ગ્રુપ ની તારીખ 18 - Aug - 20, સાંજે 8.30 થી 10.00 વાગ્યા સુધી સ્વસ્થ કેમ રહેવું અને આહાર વિહાર માં જે કાળજી લેવી એના પર હું ...