मेरी भारतीय इतिहास को समजने की रूचि रही हे और क्यों न हो
जिस देश का हर प्रदेश ज्ञान, पराक्रम, साहस, परोपकार, उद्यम और शौर्य का
अदभुत समन्वय हो और इस से आगे हज़ारो साल तक मानवता, आध्यत्म, आर्थिक
समृद्धि एवं सहकारिता और ज्ञान का पुरे विश्व में नेतृत्व किया हो। इस बार
छुट्टी मिलते राजस्थान की ओऱ रुख किया। विशेष उत्साह था और अहमदाबाद से
नजदीक होने के वजह से समय के मर्यादा समजते हुए भी अनुकूल था।
राजस्थान की बात करे तो मेवाड़ वंश को जानने का विशेष लगाव
रहा। उदयपुर और उसके आस पास चित्तौड़गढ़, सज्जनगढ़, कुंभलगढ़ जेसे ऐतिहासिक
स्थान की मुलाकात से मुझे विशेष ज्ञान और अनुभूति प्राप्त करने का सुवर्ण
अवशर मिल गया।
ऐसे ही महान मेवाड़ वंश की गाथा और उनके शौर्य, पराक्रमी वीरो
के बारे में जितना लिखू उतना कम हे और मेरे जेसे सामान्य मनुष्य के लिए इस
महान वंश के बारे में कहना अतिकठिन हे और कोई क्षति रहने पर क्षमा भी
चाहूँगा परंतु आज जब समाज में महानता और वीरता की परिभाषा बदल गयी तब ये
महान वंशज के बारे में अवगत कराना अतिआवश्यक था
उसकी भौगोलिक स्थिति का वर्णन करे तो पश्चिम की ओर पर्वतमाला
हे। यह पर्वत माला अरावली की पहाड़िया कहलाती हे। उसकी सबसे ऊँची चोटी
कुंभलगढ़ के समीप जरगा नामक जगह हे। यहाँ वन सम्पदा तथा खनिज पदार्थो की
प्राप्ति होती हे। जेसे महुआ, सागवान, इमली, पीपल, जामुन, खजूर।
मेवाड़ का राजवंश: ऐसे तो उधर जाने के पश्चात महलो की मुलाकात
से यह जानकारी प्राप्त हुई की ये भगवान श्री राम के पुत्र कुश के ही वंशज
हे और इसी लिए यह रघुकुल के सूर्यवंशी ही हे। मगर फिर इनकी ज्यादा जानकारी
6वि शताब्दी से मिलती हे। इनके प्रथम शासक गुहादित्य थे।
ऐसे तो पुरे वंश की सूचि बहुत लंम्बी हे। पर हम कुछ मुख्य इधर
बाते करेंगे। ऐसे तो हर राजा बड़ा ही पराक्रमी और महान थे। गुहादित्य बापा
रावल का नाम महान और पराक्रमी राजाओ में आता हे। यह अनुमान है कि बप्पा
रावल की विशेष प्रसिद्धि अरबोंसे सफल युद्ध करने के कारण हुई। सन् 712 ई.
में बप्पा रावल ने मुहम्मद बिन क़ासिम से सिंधु को जीता। अरबों ने उसके बाद
चारों ओर धावे करने शुरू किए। उन्होंने चावड़ों, मौर्यों, सैंधवों,
कच्छेल्लोंश् और गुर्जरोंको हराया। मारवाड़, मालवा, मेवाड़, गुजरात आदि
सब भूभागों में उनकी सेनाएँ छा गईं। राजस्थान के कुछ महान व्यक्ति जिनमें
विशेष रूप से प्रतिहार सम्राट्नागभट्ट प्रथम और बप्पा रावल के नाम उल्लेख्य
हैं।
इस के बाद इस वंश की वीरांगना सती रानी पद्मिनी,
ये चित्तौड़ की रानी थी। रानी पद्मिनि के साहस और बलिदान की गौरवगाथा
इतिहास में अमर है। रानी पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रतनसिंह के साथ ब्याही
गई थी। इनका 1326 से 1364 के शाशनकाल रहा। रानी पद्मिनी बहुत खूबसूरत थी और
उनकी खूबसूरती पर एक दिन दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नजर
पड़ गई।अलाउद्दीन किसी भी कीमत पर रानी पद्मिनी को हासिल करना चाहता था,
इसलिए उसने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। राणी पदमिनी ने सतीत्व को प्राप्त
किया पर सरणागति नहीं स्वीकारी इसी महान और सति राणी पदमिनि का वंशज हे यह
मेवाड़।
इसके बाद मेवाड़ का शाशन राणा कुम्भा के हाथो में आया और वे
समय हम मेवाड़ का सुवर्णकाल भी कह सकते हे। राणा कुम्भा सिद्ध शाशक साबित
हुए।राणा कुम्भा का शाशनकाल 1433 में आया। राणा कुम्भा न की पराक्रमी और
सौर्यवान योद्धा थे बल्कि वह कला, साहित्य, संगीत एवं स्थापत्य में भी काफी
रूचि रखते थे और उनके समय में यह फेला और समृद्धि प्राप्त हुई। चित्तौड़
में एक 'कीर्ति स्तम्भ' की स्थापना की। स्थापत्य कला के क्षेत्र में उसकी
अन्य उपलब्धियों में मेवाड़ में निर्मित 84 क़िलों में से 32 क़िले हैं,
जिसे राणा कुम्भा ने बनवाया था। वह स्वयं विद्वान तथा वेद, स्मृति,
मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण, राजनीति और साहित्य का ज्ञाता था।
ईन के बाद एक और महान और पराक्रमि राजा का नाम आता हे जिनका
नाम हे राणा सांगा। राणा सांगा का शाशनकाल 1508 से सुरु हुआ। उन्होंने 16
युद्ध किये पर सब वे जित गए। पर उनका अंतिम युद्ध बाबर से हुआ उनके मूर्छित
होने वह युद्ध हार गए, जब उनको यह पता चला तब उन्होंने यह प्रतिज्ञा ली के
वह कभी भी चित्तोर नहीं जाएंगे। उनकी एक आँख बचपन में खो चुके थे। उनका एक
हाथ और पैर भी वह इब्राहिम लोदी के साथ लड़ाई में खो चुके थे और उनके शरीर
पे 80 घाव थे।
मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज से मीरा का ब्याह
हुआ था। परंतु थोड़े समय में ही वे विधवा हो गई थीं। मीरा की कृष्ण-भक्ति न
उनके देवरों को पसंद थी, न उसकी सास-ननद को। कहते हैं मीरा को विष दिया
गया, सर्प भेजा गया परंतु मीरा बच गई। अंत में मीरा ने मेवाड़ छोड़ दिया और
वृंदावन होती हुई द्वारिका गई। वहीं जीवन के अंत तक वे रहीं। मीरा की
कीर्ति का आधार उनके पद हैं। ये पद राजस्थानी, ब्रज और गुजराती भाषाओं में
मिलते हैं। हृदय की गहरी पीड़ा, विरहानुभूति और प्रेम की तन्मयता से भरे
हुए मीरा के पद हमारे देश की अनमोल संपत्ति है।
इस वंश ने हमेशा महान और विरपुत्रो को जन्म दिया पर उनमे से
महाराणा प्रताप वह वीर योद्धा और शाशक थे जिनका सूर्य सदैव इतिहास में
चमकता रहेगा।
महाराणा प्रताप उनके पिता के ज्येष्ठ पुत्र थे, परंपरा के
अनुसार उनका ही राज्याभिषेक होना था पर महाराणा प्रताप की छोटी राणी के
पुत्र को राज्यभिषेक के लिए घोषित किया, फिर महाराणा प्रताप ने इसका कोई
विरोध नहीं किया पर भगवान राम की भांति पितृआज्ञा को समर्थन दिया। पर इसका
विरोध सभी ने किया क्योंकि एक महाराणा प्रताप ही थे जो इस मेवाड़ की मुशिकल
की घडी में राजा बन ने योग्य थे।
सबकी सहमति से उनका राज्याभिषेक हुआ। हर कोई उस समय मुग़ल
सहेनशाह अकबर की शरनागति स्वीकार रहा था पर महाराणा प्रताप को अपना
आत्मसम्मान और मेवाड़ की स्वंत्रता अधिक प्रिय थी। उन्होंने लड़ना स्वीकार
किया पर शरनागति का स्वीकार नहीं किया।
अकबर ने काफी बार संधि प्रस्ताव भेजे पर महाराणा प्रताप ने
उसे अस्वीकार कर दिया। उस समय अकबर का नाम सुनते ही कई राजा शरणागति
स्वीकार लेते और शांतिप्रिय जीवन को ज्यादा उचित समजते तब महाराणा प्रताप
ने अपने देश, प्रजा और वंश का आत्मसम्मान और स्वंत्रता के खातिर लड़ना
स्वीकारा पर झुकना नहीं।
अपने जीवन के 25 साल तक वे लड़ते रहे पर अकबर उनको न हरा सका न
बंदी बना सके। अकबर की इतनी बड़ी सेना के सामने उन्होंने अपनी कम सेना से
जो वीरता हल्दीघाटी में दिखाई वह समग्र इतिहास में अद्रितीय हे।
इनके इस ऐतिहासिक युद्ध में अनेक नाम अमर हो गए उनमे से एक
उनका अश्व चेतक जिसका एक पैर युद्ध में क्षतिग्रस्त होने के बावजूद महाराणा
प्रताप को पता होने तक नहीं दिया। चेतक का एक पैर बुरी तरह ज़ख़्मी होने
के बावजूद अपने स्वामी को सुरक्षित जगह पहोचाया और अपने प्राण त्यागे। जो
महाराणा प्रताप जिंदगी में कभी नहीं रुए आज अपने प्रिय अश्व को अपने पुत्र
की भांति गॉद में लिए रुदन करते दिखाई दिए।
अकबर के मुख्या सेनापति मानसिंह से लड़ते समय सबने उनको घेर
लिया था उस समय ऐसे ही एक विर जिन का नाम था मन्नाझाला ने दूर से देख कर
विद्युवेग से महाराणा के समीप पंहुचा और सन्देश दिया की आप को इधर से
निकलना उचित हे मेवाड़ को आपकी और भी जरूरत हे और इतनी कुशलता से राजचिन्ह
बदला की किसी को पता नहीं चला और ऐसे भक्त देशप्रेमी जो अपने स्वामी और
राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर करने में क्षणिक भी संकोच नहीं करते थे। ऐसे
महावीर मन्नाझाला को नमन।
अब मेवाड़ का आर्थिक नुकशान भारी हो गया था। आर्थिक
अर्थव्यवस्था पूरी तरह असंतूलित हो गए थी। तब और एक वीर ने अपना
राष्ट्रप्रेम और स्वामिभक्ति का अदभुत उदहारण प्रस्थापित किया और वह
महापुरुष का नाम था भामाशाह जिन्होंने अपना पूरा खज़ाना महाराणा को समर्पित
कर दिया और इतिहास में अपना नाम राष्ट्रप्रेम के लिए महान दानवीरों में
अलग से अलंकित कर दिया।
सम्पूर्ण राजपुताना का इतिहास ही मानवता, प्रेम, न्याय, देशभक्ति और वीरता का अद्रितीय उदहारण हे।


