Friday, 8 January 2016

प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था





प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था:


प्रायः साम्यवादी विचारधारा विश्वास करती हे की विश्व का सबसे पहले शोषण रहित वितरण व्यवस्था का पाठ पढ़ाया हे। परन्तु प्राचीन भारतीय साहित्य का गहन अध्ययन किया जाए तो ये उपर्युक्त कहना सही नहीं होगा।

विश्व को यदि शोषण रहित वितरण व्यवस्था की अवधारणा या न्यायपूर्ण वितरण वतावस्था का ज्ञान सर्व प्रथम प्राचीन भारतीय मनिषयो ने दिया।

शरीरमाध्यम खलु धर्म साधनं।

अर्थात जिसमे मनुष्यो की न्यूनतम आवश्यकताओ पूर्ण करके धर्म सवोपरि माना गया जिसमे चार पुरुसार्थ मोक्ष को प्राप्त करने के लिए धर्म के आधरित अर्थ की संरचना की गयी थी।

जिसमे मनुष्य विभिन्न सामग्री एकत्रित करके इदं न मम कहकर शेष सामग्री का सभी में वितरण किया जाता हे।

अपने पुरुषार्थ से धन एकत्रित करके तालाब, कुए, नहर, पाउ, गौ शाला एवं धर्म शाला बनाके वितरण व्यवस्था का श्रेष्ठ उदहारण प्रस्तुत करते हे।

केवलाध्यो भवति केवलादि (ऋग्वेद)

जो अकेला उपभोग करता हे वह पापी हे।
 
भगवद् गीता भी यही समर्थन करती हे।

भुंजते त्वघ् पापा ये पचन्त्यात्मकारणात।

अर्थात जो केवल अपने लिए उपभोग सामग्री जुटाता हे वह पाप का अकेला उपभोग करता हे।

शतहस्त समाहर सहस्र हस्त संकिरा।(अर्थववेद)

सो हाथो से अर्जन तथा हज़ार हाथो से उसके वितरण पर अर्थववेद जोर देता हे।


वितरण व्यवस्था के मुख्या बिंदू:

- जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओ की पूर्ति की प्रावधान।
- अधिशेष धन का वितरण
- सभी के कल्याण की भावना।

करारोपण व्यवस्था सिद्धान्त।

1 प्रजा रक्षण
2 लाभ पर कर
3 योजना हेतु
4 व्यथामुक्त कर
5 अधिशेष कर निषेध।


भारत के प्राचीन अर्थशास्त्रि और उनका अर्थदर्शन

महर्षि मनु का आर्थिक विचार:

अर्थ मानव जीवन की मुलभुत आवश्यकता हे। इसके बिना मानव शरीर जीवित नहीं रह सकता। अर्थ धर्म की तरह मोक्ष मार्ग में सहायक हे। क्योंकि यह स्थूल शरीर की आवश्यकता हे। अर्थ की महत्ता पर मनु कहते हे। "सब पवित्रताओ में अर्थ की पवित्रता श्रेष्ठ हे।

उत्पादन: मनु ने अपने द्वारा प्रतिपादित वर्ण व्यवस्था में उत्पादन सन्दर्भ में अधिकारी केवल वैश्य वर्ण को ही दिया हे। पशुओं की रक्षा करना, दान देना, पढ़ना, व्यापार करना, खेती करना आदि। मनु वर्ण जन्म से न मानकर गुण व् कर्म अनुसार माना हे। आपातकाल में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी उत्पादन कर सकते हे। शिल्पकर्म शूद्र वर्ण का भी आजीविका के रूप में अपने निर्वाह कारन कर सकते हे।

उद्योग व्यापार: मनु की वर्ण व्यवस्था कर्मानुसार, योग्यता एवं परिस्थिति अनुसार थी। उनके मत में यदि ब्राह्मण अपने कर्म से जीवन यापन न करे तो वह क्षत्रिय के कर्म, वैश्य के कर्म से अपना जीवन निर्वाह कर सकता हे। मनु ने बड़े यंत्रो के प्रयोग को हानिकारक मन हे।

सर्वाकरेस्वाधिकारो महायंत्रप्रवर्तनम्।
हिंसौषधीनाम स्त्रयाजीवोभीविचार मुलकर्म च।।

व्याज: अधिकतम व्याज की दर 5 प्रतिशत थी। चक्रवृद्धि व्याज व् जबरन लिखाये दस्तावेज को अमान्य माना हे।

कर: राजा कर ग्रहण में न्यायपूर्वक बर्ताव करे, राजा मनुष्य के पिता के सामान बर्ताव करे।

राजा आपत्तिकाल में वैश्य के धान्य में से 8 वा भाग, सोने चांदी में से 20वा भाग कर ले। बढई, कारीगर और शूद्र से कोई कर लेवे नहीं। क्योंकि वे राजा का उपकार करते हे। राजा को कर का अधिक भर नहीं डालना चाहिए।

मनु स्मृति में राजस्व के लिए कहा गया हे की -

अलब्धम चैव लिप्तसे लब्धम् रक्षेत्प्रयत्न: । रक्षितं वर्धयेच्चेवं वृद्ध पात्रेषु निक्षिपेत।

अर्थात राजा के द्वारा प्राप्त धन को न्यायोचित मार्ग से प्राप्त करना चाहिए तथा उपलब्ध का यत्नपूर्वक संचय करना चाहिए एवं सरंक्षित धन की वृद्धि हेतु प्रयास करते हुए प्रवधित धन का समुचित उपयोग किया जाना चाहिए। यह राज्य की समृद्धि का मूल मंत्र हे। आचार्य मनु के इस सिद्धान्त का समर्थन महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी किया। 

जन शोषण राज्य के विनाश का सूचक हे।

विदुर भी महाभारत में यही कहते हे। 

यथामधु समादते रक्षण पुष्पाणि षट्पद:।
तर्द्द्नर्थानुश्येभ्य आदध्यादविहीसया।।

अर्थात राजा को भ्रमर के समान प्रजाजन को कष्ट दिए बिना उनके धन ग्रहण करना चाहिए। 

स्मृतिशास्त्रकारो द्वारा भी कुछ नियम बताये हे।

एक वस्तु पर एक ही बार कर लगाना चाहिए। 

कररोपांन कभी भी जन असंतोष का अवसर नहीं बनना चाहिए।


शुक्राचार्य और बृहश्पति के आर्थिक विचार

प्राचीन भारत के अर्थशास्त्रियों में शुक्राचार्य और बृहश्पति के नाम बहुत सम्मान के साथ लिए जाते हैं. दोनों ही प्रखर विद्वान और कालजयी चिंतक थे, जिन्होंने आर्थिक समितियों पर खुलकर विचार किया था, उनकी उपयोगिता को दर्शाते हुए उनकी स्थापना एवं विकास पर जोर दिया तथा राज्य को उन्हें यथासंभव सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए. अर्थशास्त्र के आदि आचार्य माने जाने वाले बृहश्पति ने आर्थिक विषयों को अपने विवेचन, चिंतन का मुख्य आधार बनायाउनका आर्थिक चिंतन तत्कालीन वर्चस्ववादी शक्तियों की अपेक्षाओं के अनुकूल था, जिससे तर्काधारित ज्ञानविज्ञान के प्रति जिज्ञासा के स्थान पर रूढ़िवाद को पांव जमाने का अवसर मिला. बावजूद इसके उनकी अप्रतिम मेधा का लोहा हमें मानना ही होगा. उन्हें अर्थशास्त्र में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया है. एक स्थान पर वे लिखते हैं कि—
‘दान करना चाहिए….पचीस वर्षों तक अध्ययन–मनन आदि करना चाहिए, तत्पश्चात धनोपार्जन. सम्राट को कृषि, गोकुल तथा वाणिज्य की सुरक्षा करनी चाहिए…इनके अतिरिक्त तीन और भी हैं—माया, उपेक्षा एवं वध….धन को उसी प्रकार अर्जित करना चाहिए जिस प्रकार हाथी से हाथी पकड़ा जाता है….

भारत के प्राचीन अर्थशास्त्रियों में शुक्राचार्य का योगदान भी उल्लेखनीय हैउनका अर्थदर्शन कहीं अधिक आधुनिक एवं तर्काधारित है. इसी कारण वे भारतीय आर्थिक चिंतन के पितामह माने जाते हैंअर्थशास्त्रीय मान्यताओं की सैद्धांतिक पुष्टि के लिए सर्वप्रथम शुक्राचार्य ने ही मूल्य की परिभाषा की थी, जो आज करीब 2600 वर्ष बाद भी लगभग ज्योंकीत्यों प्रचलन में है. मूल्य का 2600 वर्ष पूर्व इतना सटीक एवं प्रामाणिक विवेचन किसी अन्य विद्वान ने नहीं किया. मूल्य को परिभाषित करते हुए शुक्राचार्य ने लिखा है कि—
‘जिसके माध्यम से कोई वस्तु प्राप्त होती है, वही उसका मूल्य है. अर्थ अथवा मूल्य वस्तु के सुलभ अथवा असुलभ होने तथा गुण या अगुण और लोगों की कामना अथवा इच्छा के अनुसार घटताबढ़ता रहता है.’8
आचार्य शुक्र मूल्य को दो तरह देखते थे—एक तो मूल्य अथवा मूल्यक, दूसरा अर्थक. मूल्य अथवा मूल्यक वह खर्च था जो किसी वस्तु को खरीदने के लिए किया जाता है, जिसे क्रेता वांछित वस्तु के बदले में विक्रेता की सहमति होने पर उसे प्रदान कर वस्तु का स्वामित्व खरीदता है. वस्तु का मूल्य उसकी उपलब्धता एवं मांग के आधार पर घटताबढ़ता रहता है. अर्थ की विशेषता वस्तु की उपयोगिता में निहित रही हैकात्यायन और शुक्राचार्य की भांति आचार्य कामंदक भी विद्वान अर्थशास्त्री थे. हालांकि अर्थशास्त्र संबंधी उनकी स्थापनाएं बहुत कुछ आध्यात्मिक किस्म की हैं. उन्होंने अर्थशास्त्र को धर्म का ही उपांग माना है. उनका मानना था कि अर्थशास्त्र में धर्म की प्रतिष्ठा होनी चाहिए. दूसरे शब्दों में अर्थिक महत्त्व के विषयों की विवेचना के लिए धार्मिक मान्यताओं तथा रीतिरिवाजों का पूरा ध्यान रखना चाहिए


चाणक्य के आर्थिक विचार

कौटिलीय अर्थशास्त्र के अनुसारराजा का मुख्य कर्तव्य था प्रजा द्वारा वर्णाश्रम धर्म और नैतिक आचरण का पालन कराना। चाणक्य राजनीतिशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'कौटिलीय अर्थशास्त्र' के रचयिता एवं चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधान मन्त्री थे। चाणक्य का लिखा हुआ अर्थशास्त्र आज भी अपने विषय का एक श्रेष्ठ ग्रंथ है। 

कौटिल्य मानते हैं कि अर्थ ही प्रधान पुरुषार्थ है और धर्म तथा काम अर्थ पर निर्भर करते हैं। 'अर्थ एवं प्रधान: इति कौटिल्य: अर्थमूलौ हि धर्मकामाविति'। फिर अर्थ की परिभाषा देते हुए वे कहते हैं कि मनुष्यों की वृत्ति अर्थ है या मनुष्यवती भूमि अर्थ है। इस अर्थ के लाभ और पालन के उपाय को बतलाने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र है। जिस अर्थ साधन का विधान अर्थशास्त्र करता है, वह त्रिवर्ग का साधक है, अथ च धर्म और काम पुरुषार्था का उन्नायक है। वास्तव में मूलत: अर्थशास्त्र का एकमात्र प्रयोजन प्रजा के सुख तथा हित का संवर्धन करना है। 

समाज की अवधारणा

कौटिल्य ने यही माना है कि यथा सम्भव आर्यों में दास भाव नहीं होना चाहिए। इसी आधार पर मैगस्थनीज ने लिखा था कि मौर्य काल में भारतीयों में वह दास प्रथा नहीं थी, जो यूनानियों में थी। किन्तु आर्यों का समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रइन चार वर्णों में बंटा था और प्रत्येक वर्ण के व्यक्तियों के शासत्रानुमोदित कर्तव्य थे। यद्यपि नियमत: कोई व्यक्ति अपने पैतृक व्यवसाय के अतिरिक्त दूसरे वर्ण का व्यवसाय नहीं कर सकता था, तथापि कुछेक लोग ऐसा व्यवसाय परिवर्तन कर लेते थे। कौटिल्य ने ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के लिए ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्न्यास आश्रमों का विधान किया है। किन्तु जब तक किसी व्यक्ति के ऊपर घरेलू दायित्व है, तब तक उसे वानप्रस्थ या सन्न्यास आश्रम में नहीं जाना चाहिए, ऐसा उनका मत है। इसी प्रकार जो स्त्रियां सन्तान पैदा कर सकती हैं, उन्हें सन्न्यास ग्रहण करने का उपदेश देना कौटिल्य की दृष्टि में अनुचित है। इससे स्पष्ट है कि कौटिल्य ने गृहस्थ आश्रम सुदृढ़ करने का अथक परिश्रम किया है। किसी प्रकार घृणा या हीनता की दृष्टि से उनको नहीं देखा गया है।

किन्तु कौटिल्य के समाज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह एक सार्वभौम समाज था। वह सभी जातियों और देशों के लिए हितकर था। यह कहने में अतिशियोक्ति नहीं है कि तत्कालीन विश्व में कौटिल्य का समाज निश्चय ही सर्वाधिक मानववादी और जनवादी था। राजसत्ता का उद्देश्य प्रजा के सुख और हित का संवर्धन तथा संरक्षण करना था। प्रतिदिन उठते ही शासक को सोचना चाहिए कि प्रजा का आर्थिक उत्थान किस प्रकार हो और अर्थानुशासन कैसे स्थापित हो। उन्नति का मूल आर्थिक उन्नति है।

प्रजासुखे संखु राज्ञ: प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञ: प्रजानां तु प्रियं हितम्।।
तस्मान्नित्योत्थतो राजा कुर्यादर्थानुशासनम्।
अर्थस्यमूलमुत्थानमनर्थस्य विषर्यय:।।

महाकवि कालिदास का कथन भी कर के सन्दर्भ में हे। 

प्रजनांमेव भुत्यर्थ स ताभ्यो बलिमग्रहित। सहस्त्रगुणं ही उत्स्त्रष्टमादते ही रसं रवि:।।

अर्थात राजा को प्रजा के कल्याण के लिए उनसे कर ग्रहण करना चाहिए जैसे सूर्य हज़ारगुना वापस देने के लिए छोटे बड़े जलाशयो से जल ग्रहण करता हे।

इस व्यवस्था के सन्दर्भ प्राचीन या श्लोक इसकी परिपूर्ति करता हे।

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्।





સ્વાસ્થ્ય સંવાદ

સ્વાસ્થ્ય સવાંદ ગ્રુપ ની તારીખ 18 - Aug - 20, સાંજે 8.30 થી 10.00 વાગ્યા સુધી સ્વસ્થ કેમ રહેવું અને આહાર વિહાર માં જે કાળજી લેવી એના પર હું ...